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मर्यादा

महारानी अरुंधती अपने महल  की खिड़की पर खड़ी थीं। बसंत ऋतु थी। पवन के मंद मंद झोंके उन्हें स्पर्श कर रहे थे। उनके ह्रदय में रोमांच और उद्विग्नता के मिले जुले भाव थे। उन्होंने जो राह चुनी थी वह काँटों से भरी हुई थी किन्तु अपने ह्रदय पर अब उनका वश नहीं रहा था। उन्हें बेसब्री से अर्ध रात्रि का इंतज़ार था। उन्होंने पास में सोये हुए कुंवर का माथा चूमा। एक मुस्कान उनके चहरे पर खिल उठी।

युवावस्था में अभी प्रवेश ही किया था कि उनका विवाह अपने से दोगुनी उम्र के महाराज अजित सिंह के साथ हो गया।  उनकी बड़ी रानी उन्हें संतान का सुख दिए बिना ही चल बसी थीं। अतः सभी की अपेक्षाएं नई रानी से जुड़ी थीं। किन्तु बहुत समय बीत जाने पर भी कोई खुश खबरी नहीं मिली। लोगों में राज्य के उत्तराधिकार को लेकर तरह तरह की बातें  होने लगीं। । राज्य वैद्य ने बताया की खोट महारानी में नहीं थी। महाराज बहुत चिंतित रहने लगे थे। किसी को गोद लेना एक समाधान  था किन्तु स्वयं की कमी को वह दूसरों के सामने नहीं लाना चाहते थे।

एक रात्रि वो एक निर्णय के साथ अंतःपुर में आये। कुछ क्षण शांत रहने के बाद गंभीर स्वर में बोले " महारानी राजा का कर्त्तव्य प्रजा की सेवा करना ही नहीं अपितु उसे एक योग्य उत्तराधिकारी प्रदान करना भी है। किन्तु हम इसके अयोग्य हैं। हमारी पत्नी और महारानी होने के नाते यह आपका भी कर्तव्य है।" उन्होंने अपनी नज़रें महारानी के चहरे पर जमा दीं और दृढ़ता के साथ बोले "सुजान सिंह हमारे सेनापति होने के साथ साथ हमारे चचेरे भाई भी हैं। वह हमारे सबसे विश्वासपात्र व्यक्ति हैं।"  कुछ ठहर कर उन्होंने फिर कहना शरू किया किन्तु इस बार उनकी नज़रें खिड़की के बाहर कुछ ताक रही थीं " हम चाहते हैं कि आप सुजान सिंह के साथ हमारे वंश को बढ़ाएं"

यह बात बात सुनकर अरुंधति को जैसे काठ मार गया हो। वह वैसे ही अविचल खड़ी रहीं। महाराज बिना कुछ बोले कक्ष से बाहर चले गए। महारानी के भीतर एक द्वन्द छिड़ गया। बहुत दिनों तक मन में हलचल मची रही। कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें। एक पत्नी के तौर  पर पराये पुरुष का ध्यान भी उनके लिए पाप था। स्वयं को किसी और को सौपना काँटों पर चलने जैसा था।  किन्तु जब वह महाराज कि तरफ देखतीं तो उनकी परेशानी को समझ विचलित हो जाती थीं। पति का मान रखना भी उनके लिए आवश्यक था। अतः राज्य और पति कि भलाई का विचार कर उन्होंने हाँ कर दी।

किन्तु उस रात्रि में जहाँ उनकी कोख में जीवन का बीज रोपित हुआ वहीँ उनके ह्रदय में भी एक नया अंकुर फूटा। वो सुजान सिंह की तरफ आकर्षित हो गयीं। सुजान सिंह का झुकाव भी उनकी तरफ था। धीरे धीरे यह आकर्षण प्रेम में बदल गया। दोनों अक्सर छिप छिप कर मिलने लगे।

आज भी महाराज राज्य के कार्य से बाहर गए हुए थे। अरुंधति बेसब्री से सुजान सिंह से मिलने की प्रतीक्षा कर रही थीं। अर्ध रात्रि में उन्होंने काली दुशाला से स्वयं को ढंक लिया ताकि रात्रि के अंधकार में स्वयं को छिपा सकें। वह तेज़ कदमों से महल के उस हिस्से कि तरफ चल दीं जहाँ सुजान सिंह उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे।

सामने वृक्ष कि आड़ में सुजान सिंह खड़े थे। अरुंधति ने अपनी दुशाला उतार कर फ़ेंक दी और उनकी तरफ भागीं। लेकिन पास पहुंचते ही ठिठक गईं। वो सुजान सिंह नहीं स्वयं महाराज थे। महाराज ने ताली बजाई तो बंधन में बंधे सुजान सिंह को लेकर दो सैनिक प्रकट हुए।

महाराज की आँखों से अंगारे बरस रहे थे। क्रोध से उबलते हुए बोले " कुलटा, व्यभिचारिणी " और वहाँ से चले गए।

अरुंधति के ह्रदय को जैसे ज़ोर से कुचल दिया गया हो। वेदना के मारे वह भूमि पर बैठ गई। क्या इस सब के लिए वही दोषी है। कितना कठिन था उसके लिए अपनी मर्यादा लांघना। उसे इसके लिए मजबूर करने वाले महाराज ही तो थे। उसके बाद जो हुआ उस पर उसका कोई वश नहीं था। वह तो जैसे एक बहाव में बहती गई।

एक प्रश्न उसके मन में उठा " क्या होता अगर महाराज इस अवस्था में होते। यदि उन्होंने भी मर्यादा लांघी होती। क्या उन्हें भी इस प्रकार दोषी ठहराया जाता। "

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