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रौशनी

अपनी बालकनी से मिसेज मेहता ने देखा आसपास की सभी इमारतें रंगबिरंगी रौशनी से जगमगा रही थीं. कुछ देर उन्हें देखनेे के बाद वह भीतर आ गईं. सोफे पर वह आंख मूंद कर बैठ गईं. बगल वाले फ्लैट में आज कुछ अधिक ही हलचल थी. पहले इस फ्लैट में बूढ़े दंपति रहते थे. तब कहीं कोई आहट नही सुनाई पड़ती थी. लेकिन इस नए परिवार में बच्चे हैं. इसलिए अक्सर धमाचौकड़ी का शोर सुनाई पड़ता रहता है. 
पहले त्यौहारों के समय उनका घर भी भरा रहता था. उन्हें क्षण भर की भी फ़ुर्सत नही रहती थी. लेकिन जब से उनका इकलौता बेटा विदेश में बस गया वह और उनके पति ही अकेले रह गए. त्यौहारों की व्यस्तता कम हो गई. फिर वह दोनों मिलकर ही त्यौहार मनाते थे. आपस में एक दूसरे का सुख दुख बांट लेते थे.
पांच वर्ष पूर्व जब उनके पति की मृत्यु हो गई तब वह बिल्कुल अकेली रह गईं. तब से सारे तीज त्यौहार भी छूट गए. अब जब वह आसपास लोगों को त्यौहारों की खुशियां मनाते देखती हैं तो अपना अकेलापन उन्हें और सताने लगता है. अतः अधिकतर वह अपने घर पर ही रहती हैं.
ऐसा लगा जैसे बगल वाले फ्लैट के बाहर गतिविधियां कुछ बढ़ गई हैं. वह उठीं और उन्होंने फ्लैट का दरवाज़ा थोड़ा सा खोल कर बाहर झांका. सात आठ साल की एक लड़की रंगोली पर दिए सजा रही थी. उसके साथ आठ नौ साल का एक लड़का उसकी मदद कर रहा था. तभी लड़की की निगाह मिसेज मेहता पर पड़ी. उन्हें देख कर वह हल्के से मुस्कुराई और बोली 'हैप्पी दीवाली'. मिसेज मेहता ने दरवाज़ा बंद कर दिया.  
वापस जाकर वह सोफे पर बैठ गईं. इतने वर्षों के बाद किसी की आत्मीयता ने उनके भीतर जमा कुछ पिघला दिया. वह उठीं और कुछ सोंचते हुए रसोई की तरफ बढ़ीं. ऊपर का कबर्ड खोला. उसमें दफ्ती का एक डब्बा था. उसे उतार कर खोला. उसमें मिट्टी के कुछ दिए रखे थे. यह उस आखिरी दीवाली के दिए थे जो उन्होंने अपने पति के साथ मनाई थी. दिओं को निकाल कर उन्होंने धोया. फिर उनमें तेल डाल कर जलाया और कमरे में चारों तरफ सजा दिया. एक निगाह उन्होंने पूरे कमरे पर डाली. कमरे में एक अलग ही रौनक थी. फ्रिज खोल कर उसमें से चॉकलेट का एक टुकड़ा निकाल कर खाया. उनके चेहरे पर मुस्कान आ गई. वह स्वयं से बोलीं 'हैप्पा दीवाली'. 
http://www.rachanakar.org/2015/11/blog-post_94.html

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