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दोराहा

खिड़की पर खडी़ सुनीता गली में खेलते बच्चों को देख रही थी. रिपोर्ट पॉज़िटिव थी. जो वह सोंच रही थी वह सच था. 
वह एक दोराहे पर खड़ी थी. उसका मन दो विपरीत दिशाओं में भाग रहा था. परस्पर विरोधी विचार उसके मन में उमड़ रहे थे. 
उसके मन में आया जाकर यह रिपोर्ट विशाल के मुंह पर मारे. उसकी कोख पर दोष लगा कर उसने अपनी दूसरी शादी को जायज़ ठहराया था. उसका गिरेबान पकड़ कर उसे दिखाए कि दोष उसकी कोख का नहीं था. उसने अपनी कोख पर हाथ रखा. अपने भीतर पल रहे उस जीव से जिसने आकार लेना शुरू किया है उसे एक लगाव सा महसूस हुआ. 
तभी अपने बॉस का वीभत्स चेहरा उसकी आंखों के सामने आ गया. उसका वह विषैला स्पर्श उसके जिस्म में एक सिहरन पैदा कर गया. अपनी कोख से उसने अपना हाथ हटा लिया. उसके मन के भाव बदल गए. जिसे वह अपने रक्त से सींच रही है वह उसी राक्षस का अंश है. 
वह कोई फैसला नहीं कर पा रही थी. इस द्वंद ने उसके मन को थका दिया था. रात भर वह बिस्तर पर करवट बदलती रही. 
रात भर की उहापोह के बाद सुबह जब वह उठी तो मन शांत था. वह भी वही अन्याय करने जा रही थी जो समाज ने उसके साथ किया था. बिना किसी कसूर के उस मासूम को दोष दे रही थी जो अभी इस दुनिया में नहीं आया है. वह उसे बिना कसूर सजा नहीं देगी. एक बार फिर उसने अपनी कोख पर हाथ फेरा जैसे उसे आश्वासन देना चाहती हो.
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