सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

अरमान

मार्निंग वॉक से लौटते हुए वह फिर मिल गया. "क्या फैसला किया मैडम आपने. मैं अस्सी हजार तक दिला दूंगा. सौदा बुरा नही है. छह महिने और निकल गए तो कोई तीस भी नही देगा. " बिना कोई जवाब दिए नीलिमा ने अपनी चाल तेज़ कर दी. पीछे से उसने आवाज़ लगाई " सोंच कर देखिएगा. "
घर पहुँच कर वह सीधे पोर्च में खड़ी कार के पास गई. कवर हटा कर देखा बहुत धूल जमा थी. वह उसे पोंछने लगी. यह कार उसके पति का अरमान थी. वह अरमान जो कई साल तक गृहस्ती की ज़िम्मेदारियों
बच्चों की पढ़ाई और उनकी जरूरतों के नीचे दबा रहा. फिर जब सारे दायित्वों से मुक्ति मिली तो उन्होंने वर्षों से दबाए इस अरमान को पूरा किया. वह बहुत खुश थे. नीलिमा के जेहन में वह क्षण अभी भी ताजा है जब वह दोनों कार लेकर पहली बार मंदिर गए थे ईश्वर को धन्यवाद करने के लिए. 
लगभग हर रोज़ ही दोनों शाम को कार से घूमने निकलते थे. कभी किसी मित्र के घर तो कभी पार्क में कुछ देर ताज़ी हवा खाने के लिए. लेकिन नौ माह पूर्व दिल के दौरे के कारण उसके पति चल बसे. तब से इस कार के पहिए भी थम गए हैं. अब तो हर कोई इसे बेंच देने की सलाह देता है.
उसके पति अक्सर कहते थे " नीलू तुम भी कार चलाना सीख लो. " वह छेड़ने के इरादे से कहती " मैं क्यों सीखूं मेरे पास तो ड्राइवर है. " उसके पति झूठा गुस्सा दिखाते " तो मैं तुम्हारा ड्राइवर हूँ. " वह हंस कर कहती " जब आप हैं तो मुझे किस बात की फ़िक्र. " बात वहीं ख़त्म हो जाती. कार साफ कर उसने फिर से कवर डाल दिया. 
" बस यहीं रोक दो. " अॉटो वाले को पैसे देकर नीलिमा आगे बढ़ गई. कुछ ही कदमों की दूरी थी. उसने बोर्ड को पढ़ा और भीतर चली गई. 
" आप सीखेंगी ड्राइविंग. " उस आदमी ने संशय के साथ कहा.
" हाँ मैं सीखूंगी. " नीलिमा ने पूर्ण विश्वास के साथ उत्तर दिया. औपचारिकताएं पूरी कर वह बाहर आ गई. अब वह अपने पति का एक और अरमान पूरा करेगी. 

Armaan on Tumbhi.com

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

मुसाफिर

कल रात अचानक ही बंसल साहब का निधन हो गया। मोहल्ले में जब यह समाचार फैला तो लोग उन्हें अंतिम विदाई देने उनके घर पर एकत्र हुए। अर्थी निकलने की तैयारी हो रही थी। मोहल्ले के दो बुज़र्ग खन्ना जी और पांडे जी बाहर बैठे बात कर रहे थे। "अरे यह तो सबके साथ होना है। हम सब तो मुसाफिर हैं। ना जाने कब स्टेशन आ जाए और उतरना पड़े।" पांडे जी ने दार्शनिक अंदाज़ में कहा। "सही कहा पांडे जी। लेकिन तब भी इंसान माया में फंसा रहता है।" "सुना है बंसल किसी केस में फंसा था। पेंशन अटकी हुई थी।" "अजी जुगाड़ू बंदा था। ऊपर तक पहुँच थी। सब क्लियर हो गया।" खन्ना जी ने रहस्य खोला। "क्या लाभ ऐसे पैसे का। मरने पर इकलौता बेटा भी साथ नही है।"  "सही कहा पांडे जी। अब बेचारी मिसेज बंसल अकेली पड़ गईं।" "अब यह तो सबके साथ है। इस उम्र में जीवनसाथी का ही सहारा होता है।" "बिल्कुल सही। भाभी जी कैसी हैं।" "बेटे बहू के लिए हुड़कती रहती हैं।" "तो शेखर के पास क्यों नही चले जाते।" "उनकी अपनी जिंदगी है। दोनों वर्किंग हैं। वहाँ भी दिन...

भूचाल

लाला हरबंसलाल अपनी पुशतैनी हवेली के आंगन में बैठे थे. जो सामान ले जाया जा सकता था वह गठरियों में बंधा रखा था. उस पर एक नजर डाल कर उन्होंने गहरी सांस ली.  आंगन में गौरैया रोज़ की तरह फुदक रही थी. मुंडेर पर बैठा कौवा भी वैसे ही कांव कांव कर रहा था. प्रकृति का हर काम वैसे ही चल रहा था. कहीं कोई उथल पुथल नही थी सिवाय इंसानी ज़िदगी के. इंसानों के जीवन में भूचाल आया था. मजहब के नाम पर मुल्क दो हिस्सों में बंट गया था. इस बंटवारे ने बहुतों को उनकी जड़ों से अलग कर दिया था.

केंद्र बिंदु

पारस देख रहा था कि आरव का मन खाने से अधिक अपने फोन पर था। वह बार बार मैसेज चेक कर रहा था। सिर्फ दो रोटी खाकर वह प्लेट किचन में रखने के लिए उठा तो पारस ने टोंक दिया। "खाना तो ढंग से खाओ। जल्दी किस बात की है तुम्हें।" "बस पापा मेरा पेट भर गया।" कहते हुए वह प्लेट किचन में रख अपने कमरे में चला गया। पारस का मन भी खाने से उचट गया। उसने प्लेट की रोटी खत्म की और प्लेट किचन में रख आया। बचा हुआ खाना फ्रिज में रख कर वह भी अपने कमरे में चला गया। लैपटॉप खोल कर वह ऑफिस का काम करने लगा। पर काम में उसका मन नही लग रहा था। वह आरव के विषय में सोच रहा था। उसने महसूस किया था कि पिछले कुछ महीनों में आरव के बर्ताव में बहुत परिवर्तन आ गया है। पहले डिनर का समय खाने के साथ साथ आपसी बातचीत का भी होता था। आरव उसे स्कूल में क्या हुआ इसका पूरा ब्यौरा देता था। किंतु जबसे उसने कॉलेज जाना शुरू किया है तब से बहुत कम बात करता है। इधर कुछ दिनों से तो उसका ध्यान ही जैसे घर में नही रहता था। पारस सोचने लगा। उम्र का तकाज़ा है। उन्नीस साल का हो गया है अब वह। नए दोस्त नया माहौल इस सब में उसने अपनी अलग दुनि...