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धूप छांव

विमला ने छत पर मसाले सूखने को डाले तो कुछ ही देर में बदली छा गई। कुछ ठहर कर वह उन्हें उठाने गई तो फिर तेज़ धूप निकल आई।
वह परेशान हो गई। समझ नहीं पा रही थी कि क्या करे। उसने एक बार अपना मोबाइल चेक किया। ना कोई कॉल थी ना ही मैसेज। 
विमला मन ही मन बड़बड़ाई। यह क्या बात हुई।
उसे पूरी उम्मीद थी कि आज वह लोग अपना फैसला दे देंगे। अगर उन लोगों ने हाँ कर दी तो उसकी सबसे बड़ी चिंता खत्म हो जाएगी।
बादल छंट गए थे। कड़ी धूप निकल आई थी। उसने मसाले शाम तक पड़े रहने दिए।
शाम को जब वह मसाले लेकर नीचे आई तो बेटी घर आ गई थी।
विमला ने चाय बनाई और बेटी के साथ पीने लगी।
"क्या है मम्मी कई दिनों से परेशान लग रही हो?" 
विमला ने बेटी के सामने मन खोल दिया "अनुज के मम्मी पापा का कुछ समझ नहीं आ रहा। हर बार आश्वासन देते हैं। कोई फैसला नहीं करते।"
"बस इतनी सी बात। तो तुम फैसला कर दो। उन्हें खुद मना कर दो।"
बेटी ने फोन मिला कर विमला को पकड़ा दिया।

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