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ठहराव

"चलो ना भाभी। पार्टी में सब जान पहचान के ही होंगे। आपको अच्छा लगेगा।" सुमन ने उदास बैठी संध्या से कहा।
जब से संध्या के पति की मृत्यु हुई थी तब से वह कहीं आती जाती नहीं थी। बस अपने में खोई रहती थी। इस बात को लेकर घर वाले बहुत चिंतित थे। सब उसे इस दुख से बाहर लाना चाहते थे। सुमन अक्सर ही इस बात का प्रयास करती रहती थी। आज उनके परिचित परिवार में पार्टी थी। सुमन चाहती थी कि संध्या वहाँ जाए ताकि उसका मन बदल सके। लेकिन संघ्या मान नहीं रही थी।
"तुम जानती हो ना सुमन मैं अब कहीं नहीं आती जाती हूँ। मुझसे ज़िद मत करो।"
उसी समय उसकी सास भीतर आई। उसके बगल में बैठ कर प्यार से समझाते हुए बोली।
"बेटा जीवन को बहती नदी की तरह होना चाहिए। जो कठिनाइयों में भी बहती रहे। इसे एक दायरे में बाँधने से इसमें निष्क्रियता आ जाती है। भले ही वह दायरा हमारे सबसे बड़े दुख का हो। हमें उसमें नहीं बँधना चाहिए।"
अपनी बात कह कर वह कमरे से चली गईं। सुमन भी उनके साथ चली गई।
संध्या उनकी बात पर विचार करने लगी। सच में उसने अपने जीवन को इस तरह अपने दुख में डूबो दिया था कि अब उसके लिए कुछ बचा ही नहीं था।
कुछ देर बाद जब वह कमरे से बाहर गई तो सबके चेहरों पर खुशी की लहर दौड़ गई। संध्या पार्टी में जाने के लिए तैयार होकर आई थी।

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