वह जानता था कि उसकी चलाई गोली सही निशाने पर लगी थी। उसे तसल्ली हुई कि एक और खतरा कम हुआ। पिछले दो घंटे से मुटभेड़ जारी थी। दोपहर को उन्हें खबर मिली थी कि कैंप पर आतंकी हमला हुआ है। वह अपने साथियों के साथ उनका मुकाबला करने आया था। दोनों साथी मुटभेड़ में मारे जा चुके थे। वह भी बुरी तरह घायल था। वह दो तरफा लड़ाई लड़ रहा था। एक आतंकियों से दूसरी अपनी टूटती सासों से। पर वह दोनों मोर्चों पर डटा था। तभी किसी आतंकी के पास आते कदमों की आहट सुनाई पड़ी। उसने अपनी टूटती शक्ती को समेटा और ट्रिगर दबा दिया। किंतु सांसों की डोर टूट गई।
पारस देख रहा था कि आरव का मन खाने से अधिक अपने फोन पर था। वह बार बार मैसेज चेक कर रहा था। सिर्फ दो रोटी खाकर वह प्लेट किचन में रखने के लिए उठा तो पारस ने टोंक दिया। "खाना तो ढंग से खाओ। जल्दी किस बात की है तुम्हें।" "बस पापा मेरा पेट भर गया।" कहते हुए वह प्लेट किचन में रख अपने कमरे में चला गया। पारस का मन भी खाने से उचट गया। उसने प्लेट की रोटी खत्म की और प्लेट किचन में रख आया। बचा हुआ खाना फ्रिज में रख कर वह भी अपने कमरे में चला गया। लैपटॉप खोल कर वह ऑफिस का काम करने लगा। पर काम में उसका मन नही लग रहा था। वह आरव के विषय में सोच रहा था। उसने महसूस किया था कि पिछले कुछ महीनों में आरव के बर्ताव में बहुत परिवर्तन आ गया है। पहले डिनर का समय खाने के साथ साथ आपसी बातचीत का भी होता था। आरव उसे स्कूल में क्या हुआ इसका पूरा ब्यौरा देता था। किंतु जबसे उसने कॉलेज जाना शुरू किया है तब से बहुत कम बात करता है। इधर कुछ दिनों से तो उसका ध्यान ही जैसे घर में नही रहता था। पारस सोचने लगा। उम्र का तकाज़ा है। उन्नीस साल का हो गया है अब वह। नए दोस्त नया माहौल इस सब में उसने अपनी अलग दुनि...
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