वह जानता था कि उसकी चलाई गोली सही निशाने पर लगी थी। उसे तसल्ली हुई कि एक और खतरा कम हुआ। पिछले दो घंटे से मुटभेड़ जारी थी। दोपहर को उन्हें खबर मिली थी कि कैंप पर आतंकी हमला हुआ है। वह अपने साथियों के साथ उनका मुकाबला करने आया था। दोनों साथी मुटभेड़ में मारे जा चुके थे। वह भी बुरी तरह घायल था। वह दो तरफा लड़ाई लड़ रहा था। एक आतंकियों से दूसरी अपनी टूटती सासों से। पर वह दोनों मोर्चों पर डटा था। तभी किसी आतंकी के पास आते कदमों की आहट सुनाई पड़ी। उसने अपनी टूटती शक्ती को समेटा और ट्रिगर दबा दिया। किंतु सांसों की डोर टूट गई।
गुप्ता जी पार्क में आए तो अभी भी वह नहीं आई थीं। पहले दो दिन भी वह प्रतीक्षा कर लौट गए थे। वह बैठ कर इंतज़ार करने लगे। पत्नी की मृत्यु को एक वर्ष होने वाला था। पहले हर शाम वह अपनी पत्नी के साथ घर में लगाए हुए छोटे से बागीचे में बैठ कर चाय पीते थे। पर पत्नी के ना रहने पर शाम का वह समय जैसे काटने को दौड़ता था। अतः उन्होंने घर के पास बने इस पार्क में आना शुरू किया। यहीं उनकी मुलाकात सविता जी से हुई। दोनों ने ही एक दूसरे के एकाकीपन को पहचान लिया। हमदर्दी उन्हें एक दूसरे के समीप ले आई। रोज़ शाम वह इसी पार्क में एक दूसरे के साथ कुछ समय बताते थे। कभी कुछ बातचीत करते तो कभी बिना कुछ बोले एक दूसरे के साथ को महसूस करते। गुप्ता जी ने घड़ी देखी। प्रतीक्षा करते हुए आधा घंटा निकल गया था। उन्हें चिंता होने लगी। कहीं कोई अनहोनी तो नहीं हो गई। बेचैनी में वह इधर उधर टहलने लगे। तभी सविता जी आती दिखाई दीं। "कहाँ रह गई थीं आप। दो दिनों से आई भी नहीं।" गुप्ता जी ने परेशान होकर पूँछा। बेंच पर बैठते हुए सविता जी बोलीं। "दरअसल पोते को बुखार था। इसलिए नहीं आ पाई। आज कुछ ठीक था तो आ गई।" ...
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