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संदेश

पराए बच्चे

  दयाल बाबू आज फिर चोटिल होकर घर आए। घावों पर दवा लगाती हुई पत्नी बड़बड़ाने लगी। "क्यों जाते हैं उस बस्ती में नशे के खिलाफ प्रचार करने के लिए। अभी तो थोड़ा बहुत पीट कर छोड़ दिया। कल को जान से मार दिया तो ?" "जो भी हो इस डर से मैं चुप होकर नहीं बैठूंगा। वो लोग छोटे छोटे बच्चों को नशे का आदी बना रहे हैं।" "पराए बच्चों की फिक्र है। कभी अपने बच्चों के बारे में सोंचा है।" "अपने बच्चों के लिए तो अपना फर्ज़ निभा ही रहा हूँ। पर मेरे लिए वो बच्चे भी अपने हैं। मैं उन्हें भटकते नहीं देख सकता हूँ।" दयाल बाबू ने रूई ली और खुद ही जख्म साफ करने लगे।

वापसी

नमित ने जब अपना फैसला सुनाया तो उसके माता पिता परेशान हो गए। माँ ने रोते हुए कहा कि उन लोगों ने मेहनत करके उसे इसलिए पढ़ाया था कि वह गांव में जाकर अपना जीवन बर्बाद कर ले। नमित जानता था कि गांव की समस्या पलायन से दूर नहीं होगी। उल्टा शहरों पर अनावश्यक बोझ बढ़ेगा। इसलिए जलविज्ञान की पढ़ाई करने के बाद उसने तय किया था कि अपने गांव जाकर हर साल पड़ने वाले सूखे से निपटने की लड़ाई लड़ेगा।

संध्या आरती

अनिल जब ऑटो से उतरा तो बिल्डिंग देख कर लगा कि यहाँ तो सब साधारण फ्लैट ही होंगे। उसे आश्चर्य हुआ। महंगी जीवनशैली के आदी उसके चाचा यहाँ कैसे रहते होंगे। पर जब उससे बात हुई थी तब तो उन्होंने अपना नया पता यही बताया था।   अनिल कोई दस साल बाद इस शहर में अपने गुरूजी के समागम में हिस्सा लेने आया था। वह उन्हें बहुत मानता था। छोटी उम्र में उन्होंने सन्यास ले लिया था। सारे देश में बहुत से आश्रम थे उनके। वह चाह रहा था जल्द से जल्द अपने गुरूजी की तस्वीर रख कर संध्या आरती कर सके। जब वह सीढ़ियां चढ़ कर तीसरे फ्लोर पर पहुँचा तो उसे और अधिक आश्चर्य हुआ। यह एक कमरे का साधारण फ्लैट था। सिर्फ एक पंखा लगा था। चाचाजी फर्श पर चटाई डाले बैठे थे। "चाचाजी आपने वकालत छोड़ दी। अब आप इतने साधारण ढंग से क्यों रहते हैं ?" "वकालत मैं अभी भी करता हूँ। फीस भी पहले की तरह ही वसूलता हूँ। अपनी ज़रूरतें पूरी करने के बाद जो बचता है वह समाज की आवश्यक्ता पर खर्च कर देता हूँ।" अपने चाचा की बात सुन कर संध्या आरती करने की अनिल की इच्छा खत्म हो गई।

संघर्ष

आई.आई.टी की पढ़ाई पूरी करते ही वैभव को एक बड़ी आईटी कंपनी ने अच्छा पैकेज ऑफर किया। सारे कैंपस में वैभव की इस सफलता की चर्चा ज़ोरों पर थी। ज्वाइनिंग से पहले वैभव अपने माता पिता से मिलने जाने की तैयारी कर रहा था। आज वह उन लोगों के प्रति कृतज्ञता महसूस कर रहा था। बचपन में जब उसके जन्मदिन पर सस्ते खिलौने मिलते थे तब वह बहुत दुखी होता था। अपने दोस्तों को खिलौने दिखाने में शर्माता था। पर आज उसे एहसास हो रहा था कि उसके माता पिता ने कितनी कठिनाइयां सह कर उसे इस मुकाम तक पहुँचाया है। महंगे खिलौनों पर इतराने वाले उसके दोस्त कितने पीछे रह गए थे।

मौन आक्रोश

पोलिंग बूथ में लाइन में लगा मुन्ना अपनी बारी आने की प्रतीक्षा कर रहा था। मन में एक उथल पुथल मची थी। बढ़ती महंगाई ने उसकी कमर तोड़ कर रख दी थी। पढ़ा लिखा बेटा बेरोज़गार था। जवान बेटी जब कॉलेज के लिए निकलती थी तो मन में डर रहता था कि सुरक्षित आएगी या नहीं। इन सबके बीच आज वह वोट डालने आया था। अपनी बारी आने पर भीतर गया। दस्तखत कर उंगली पर निशान लगवाया। फिर वोटिंग मशीन की तरफ चला गया। कौन सा बटन दबाना है वह पहले ही तय कर चुका था। इतने सालों के अनुभव ने बता दिया था कि सत्ता मिलने पर सभी उसके मद में डूब जाते हैं। उसने नोटा दबा दिया।

दस्तक

मनीषा बहुत देर से अपने कमरे में बैठी योजना बना रही थी कि भतीजी के  मुंडन की पार्टी में क्या क्या होना चाहिए। अभी तक उसे लगता था कि भाई और उसकी पत्नी को दुनियादारी का अनुभव नहीं है। अतः अभी भी हर काम का दायित्व उस पर ही है। हलांकि उसकी सहेली अचला ने कई बार समझाया था कि यह तुम्हारी भूल है। उन्हें उनकी ज़िंदगी जीने दो। तुमने भाई को उसके पैरों पर खड़ा कर अपना दायित्व पूरा कर लिया। अब उसे खुद सब करने दो। तुम अब अपने जीवन पर ध्यान दो। लेकिन मनीषा मानती ही नहीं थी। वह अपनी योजना बताने भाई के कमरे की तरफ बढ़ी। दस्तक देने ही जा रही थी कि भाभी की आवाज़ सुनाई पड़ी। "परी के मुंडन में जो होना है वह मेरी पसंद का होगा। तुम दीदी को समझा देना। बेवजह दखल ना दें।" मनीषा ने अपना हाथ रोक लिया। कुछ पल चुप रहने के बाद मुस्कुराई। एक जबरन ओढ़े गए बोझ से उसे छुट्टी मिल गई थी।

सच्ची पूजा

ह्रदय बाबू करीब साल भर बाद इस मंदिर में आए थे। जब भी उनके जीवन में किसी चीज़ की आवश्यक्ता होती थी तो वह इसी मंदिर में आकर देवी से उसके लिए प्रार्थना करते थे। ह्रदय बाबू पूजा का सामान लेने दुकान पर गए तो दुकानदार को देख चौंक गए। वह सरजू था। पहले छोटी सी टोकरी में रख कर मंदिर के बाहर फूल बेचता था। "ये तुम्हारी दुकान है सरजू ?" "हाँ बाबूजी इस नवरात्री के पहले दिन ही उद्घाटन किया है।" "वाह इतनी जल्दी तरक्की कर ली। कोई पूजा वगैरह करवाई थी क्या ?" "बाबूजी हम बहुत पढ़े लिखे तो हैं नहीं पर मंदिर की दीवार पर लिखा है कर्म ही पूजा है। हमने वही पूजा की है।" ह्रदय बाबू सोंच रहे थे कि मंदिर से सबसे बड़ा ज्ञान तो सरजू ने लिया है।