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न खुदा ही मिला न बिसाले सनम

हमारा नाम है सत्य नारायण दुबे। इस के आगे एक अदद ' मजनू' हमने खुद लगा लिया है। कारण एक तो हम किसी के प्यार में मजनू बन गए थे और दूजा ये की यह हमारा उपनाम है। वैसे हम अपने परिवार के सबसे अधिक एलिजिबिल बैचलर थे। छब्बीस की उम्र, अच्छी नौकरी, देखने सुनने में भी कोई बुरे नहीं थे। यही कारण था की कुंवारी कन्याओं के पिता हमारे घर के चक्कर लगा रहे थे। हमारे पिता भी हर अवसर को अच्छी तरह से तौल कर देख रहे थे। हम भी बहुत उत्साहित थे की तभी वह घटना घाट गयी। अजी हमें किसी से प्यार हो गया।
हुआ यूं  की एक रोज़ हमारा एक दोस्त एक कवि सम्मलेन के पास ले आया। हमें कविताओं में कोई दिलचस्पी नहीं थी किन्तु उसने एक कवियत्री ' मनचली' का कुछ इस प्रकार ज़िक्र किया की हम उन्हें सुनने को बेताब हो गए। मनचली जी ने जैसे ही अपना कविता पाठ आरंभ किया  उनकी आवाज़ और शब्दों ने हम पर वो जादू किया की हम उनके फैन हो गए। घर लौटे तो उनकी आवाज़ अभी भी कानों में गूँज रही थी।
कविताओं में हमारी दिलचस्पी बढ़ गयी न केवल पढ़ने में बल्कि लिखने में भी। एक दिन हम मनचली जी के घर का पता लगा कर उनके मुरीद के तौर पर उनके घर जा पहुंचे। साथ में हमारे द्वारा रचित एक कविता भी थी। उन्होंने हमारा स्वागत किया। हमने अपनी कविता दिखाते हुए उस पर राय मांगी। उन्होंने हमारे प्रयास को सराहा और कुछ एक जगहों पर सुधार करने को कहा जिसे हमने सहर्ष स्वीकार कर लिया।
हम अक्सर अपनी नई रचना के साथ उनके घर पहुच जाते। अब वो हमसे बेतकल्लुफ़ हो गयी थीं। हमारे साथ अपनी निजी बातें भी करती थीं। उनका यह खुलापन हमें यह एहसास करता था की वह हमें चाहती हैं। हम तो सर से पाँव तक उनके इश्क में डूबे थे। उनकी हर बात से हमें हमारे लिए प्यार बरसता प्रतीत होता था।
एक बार जब हम उनके घर पहुंचे तो वह बहुत खुश नज़र आ रही थीं। हमें देख कर बोलीं " आज हमें आपको कुछ ख़ास बात बतानी है।" हमारे दिल की धडकनें बढ़ गयीं। हम सांस रोक कर वह सुनाने का इंतजार करने लगे जो हम सुनना चाहते थे। किन्तु जो कुछ उन्होंने बताया सुन कर आँखों के सामने अँधेरा छा गया। वो मस्ताना नाम के साथी कवि से प्रेम करती थीं और जल्द ही उनसे शादी करने वाली थीं। अपने टूटे दिल की उपमा किस  से दें हम समझ नहीं पा रहे थे। तबियत बिगड़ जाने का बहाना बना कर हम घर वापस आ गए।
कुछ महीनों तक हम बदहवास से रहे। किसी काम में दिल नहीं लगता। कुछ दिनों तक ऐसे ही चला फिर हमने सोंचा चलो दिल टूटा तो क्या हुआ सुना है दिल जले अच्छे शायर होते हैं तो हमने थोक के भाव कविताएँ लिखनी शुरू कर दीं। शीघ्र ही एक किताब पूरी कर ली। नाम दिया 'हाल-ऐ -मजनू ' और हम उसे लेकर प्रकाशकों के दफ्तर के चक्कर काटने लगे। पर न तो मजनू को लैला मिली न हमारी किताब को प्रकाशक।  अब तो अपनी लड़कियों का रिश्ता लेकर आने वालों ने भी चक्कर लगाना बंद कर दिया था। हमारे तो दोनों जहां लुट गए। जब भी हमारे पिता से हमारी नज़रें मिलती वो हमें ऐसे घूरते जैसे हमने उनकी किसी जागीर पर जलती हुई माचिस की तीली फ़ेंक दी हो।


http://www.tumbhi.com/writing/short-stories/na-khuda-hi-mila-na-/ashish-trivedi/40328#.U6pcNPWUAIg.gmail








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