सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

रचनाकार: आशीष त्रिवेदी की लघुकथा - कैसे कैसे रंग

रचनाकार: आशीष त्रिवेदी की लघुकथा - कैसे कैसे रंग

 दरवाज़ा खोला तो सामने जो शख्स खड़ा था कुछ पहचाना सा लगा। याद करने का प्रयास कर ही रहा था की वही बोल पड़ा " क्या हुआ पहचाना नहीं मैं विशाल।" पहचान में नहीं आ रहा था। सूखे हुए पपड़ाये होंट , बिखरे बाल। पहले से कुछ दुबला हो गया था। " ओह  तुम " भीतर आओ कहकर मैं एक ओर हट गया। तकरीबन 7 साल के बाद हम मिल रहे थे। पहले तो क्या रौनक थी चहरे पर।  क्या हो गया इसे।
वो आकर सोफे पर बैठ गया। " घर में और कोई नहीं है क्या।" उसने पूंछा। "हाँ पत्नी बच्चों के साथ अपने मायके गई है।" "तुम बताओ यह क्या हाल बना रखा है तुमने।" मैंने पूंछा।
"बताऊँगा सब बताऊँगा पहले यदि कुछ खाने को हो तो ले आओ। सुबह से कुछ नहीं खाया।"
मैंने ब्रेड और जैम लाकर उसके सामने रख दिया। "आज कल तो बस यही है।"
वह ब्रेड  पर जैम लगा कर खाने लगा. उसे खाते देख कर लगा जैसे वह कई दिनों का भूखा हो। मेरे मन में उसके प्रति करुणा जाग गई।
विशाल मेरे बचपन का साथी था। बचपन में हमनें कई शरारतें कीं। साथ साथ स्कूल गए फिर कॉलेज में भी साथ पढ़े। कॉलेज ख़त्म कर मैं एमबीए करने चला गया। उसने वहीँ रह कर बिजनेस शुरू कर दिया। जब पिछली दफ़ा मिला था तो बेहद खुश था। व्यापार अच्छा चल रहा था। शादी भी कर ली थी। फिर जाने क्या हुआ।
जब वह खा चुका  तो मैनें अपना सवाल दोहराया। एक ठंडी साँस लेकर वह बोला " जब मुसीबत आती है तो चारों तरफ से घेर लेती है। अच्छे खासे कारोबार को न जाने किस की नज़र लग गयी। अचानक घाटा होने लगा। उसी समय पत्नी को भी कैंसर हो गया। उसके इलाज ने कमर तोड़ दी। कारोबार बंद हो गया। पत्नी भी चल बसी। मैं तो पूरी तरह से टूट गया।" यह कह कर वह रोने लगा। मैंने उसे सांत्वना देने का प्रयास किया। खुद को सँभालते हुए बोला " माफ़ करना खुद पर काबू नहीं कर सका।" उसकी इस दशा को देख कर मन द्रवित हो गया।
उसका मन बहलाने के लिए मैं हमारे बचपन के किस्से बताने लगा। कुछ देर में वह भी सामान्य हो गया। अब वह भी बचपन की कई मजेदार बातें बताने लगा। इस तरह बातें करते करते बहुत समय बीत गया। अचानक घड़ी देखते हुए वह बोला " अरे इतना वक़्त बीत गया पता ही नहीं चला। अब चलता हूँ।" यह कह कर वह उठाने को हुआ पर कुछ सोंच कर बैठ गया। किन्तु बोला कुछ नहीं। मुझे लगा वह कुछ कहना चाहता है पर संकोचवश कह नहीं पा रहा है। "कुछ बात है तो कहो।" मैंने उसे तसल्ली देते हुए कहा। "अब तुमसे क्या संकोच" वह कुछ झिझकते हुए बोला " दरअसल जेब एक दम खाली है। यदि तुम कुछ पैसे दे पाते हज़ार पाँच सौ जितने हो सकें।"  "देखता हूँ"  कह कर मैं उसे वहां बिठा कर भीतर चला गया। मैंने अलमारी से हज़ार का नोट निकाला। फिर कुछ सोंच कर उसे वापस रख कर पाँच सौ रुपये का नोट लाकर उसे दे दिया। उसने जेब में रखते हुए कहा   " बहुत धन्यवाद, जैसे ही मेरे पास पैसे होंगे वापस कर दूँगा। " यह कह कर वह तेज़ी से निकल गया।
उसके जाने के बाद मन कुछ उदास हो गया था। मैं  टीवी देख कर मन बहलाने की कोशिश करने लगा। एक बार फिर दरवाज़े की घंटी बजी। इस बार मेरा मित्र विपिन था। विपिन मुझे और विशाल दोनों को कॉलेज से जानता  था। मुझे उदास देख कर बोला " क्या बात है, भाभी और बच्चों की बहुत याद आ रही है।"  " नहीं यार, वो अपना विशाल याद है। आज वो आया था।"  "तो वो यहाँ भी आया था। कुछ दिन पहले मेरे पास भी आया था। कितने का  चूना लगाया।" विपिन ने कुछ कटु स्वर में कहा। मुझे उसका इस तरह बोलना अखर गया "ऐसा मत कहो बेचारा मुसीबत में है।"   "काहे की मुसीबत एक नंबर का ड्रामेबाज़ है। अच्छा खासा कारोबार था। अपने जुए और शराब की लत के चलते सब चौपट कर दिया। बेचारी इस की बीवी बिना इलाज के मर गयी। वो मेरे साले की ससुराल से इस की पत्नी का सम्बंध था. उसने मुझे इस की सारी करतूतें बताईं।"
विपिन के शब्द नश्तर बन कर सीने में उतर गए। इंसान इतना बदल जाता है। मेरे साथ बचपन में खेलने वाला मेरा मित्र आज कुछ पैसों के लिए मेरी भावनाओं से खेल गया।


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

ना मे हाँ

सब तरफ चर्चा थी कि गीता पुलिस थाने के सामने धरने पर बैठी थी। उसने अजय के खिलाफ जो शिकायत की थी उस पर कोई कार्यवाही नहीं हुई थी।  पिछले कई महीनों से गीता बहुत परेशान थी। कॉलेज आते जाते अजय उसे तंग करता था। वह उससे प्रेम करने का दावा करता था। गीता उसे समझाती थी कि उसे उसमें कोई दिलचस्पी नहीं है। वह सिर्फ पढ़ना चाहती है। लेकिन अजय हंस कर कहता कि लड़की की ना में ही उसकी हाँ होती है।  गीता ने बहुत कोशिश की कि बात अजय की समझ में आ जाए कि उसकी ना का मतलब ना ही है। पर अजय नहीं समझा। पुलिस भी कछ नहीं कर रही थी। हार कर गीता यह तख्ती लेकर धरने पर बैठ गई कि 'लड़की की ना का सम्मान करो।'  सभी उसकी तारीफ कर रहे थे।

केंद्र बिंदु

पारस देख रहा था कि आरव का मन खाने से अधिक अपने फोन पर था। वह बार बार मैसेज चेक कर रहा था। सिर्फ दो रोटी खाकर वह प्लेट किचन में रखने के लिए उठा तो पारस ने टोंक दिया। "खाना तो ढंग से खाओ। जल्दी किस बात की है तुम्हें।" "बस पापा मेरा पेट भर गया।" कहते हुए वह प्लेट किचन में रख अपने कमरे में चला गया। पारस का मन भी खाने से उचट गया। उसने प्लेट की रोटी खत्म की और प्लेट किचन में रख आया। बचा हुआ खाना फ्रिज में रख कर वह भी अपने कमरे में चला गया। लैपटॉप खोल कर वह ऑफिस का काम करने लगा। पर काम में उसका मन नही लग रहा था। वह आरव के विषय में सोच रहा था। उसने महसूस किया था कि पिछले कुछ महीनों में आरव के बर्ताव में बहुत परिवर्तन आ गया है। पहले डिनर का समय खाने के साथ साथ आपसी बातचीत का भी होता था। आरव उसे स्कूल में क्या हुआ इसका पूरा ब्यौरा देता था। किंतु जबसे उसने कॉलेज जाना शुरू किया है तब से बहुत कम बात करता है। इधर कुछ दिनों से तो उसका ध्यान ही जैसे घर में नही रहता था। पारस सोचने लगा। उम्र का तकाज़ा है। उन्नीस साल का हो गया है अब वह। नए दोस्त नया माहौल इस सब में उसने अपनी अलग दुनि...

दिया

गुप्ता जी पार्क में आए तो अभी भी वह नहीं आई थीं। पहले दो दिन भी वह प्रतीक्षा कर लौट गए थे। वह बैठ कर इंतज़ार करने लगे। पत्नी की मृत्यु को एक वर्ष होने वाला था। पहले हर शाम वह अपनी पत्नी के साथ घर में लगाए हुए छोटे से बागीचे में बैठ कर चाय पीते थे। पर पत्नी के ना रहने पर शाम का वह समय जैसे काटने को दौड़ता था। अतः उन्होंने घर के पास बने इस पार्क में आना शुरू किया। यहीं उनकी मुलाकात सविता जी से हुई। दोनों ने ही एक दूसरे के एकाकीपन को पहचान लिया। हमदर्दी उन्हें एक दूसरे के समीप ले आई। रोज़ शाम वह इसी पार्क में एक दूसरे के साथ कुछ समय बताते थे। कभी कुछ बातचीत करते तो कभी बिना कुछ बोले एक दूसरे के साथ को महसूस करते। गुप्ता जी ने घड़ी देखी। प्रतीक्षा करते हुए आधा घंटा निकल गया था। उन्हें चिंता होने लगी। कहीं कोई अनहोनी तो नहीं हो गई। बेचैनी में वह इधर उधर टहलने लगे। तभी सविता जी आती दिखाई दीं। "कहाँ रह गई थीं आप। दो दिनों से आई भी नहीं।" गुप्ता जी ने परेशान होकर पूँछा। बेंच पर बैठते हुए सविता जी बोलीं। "दरअसल पोते को बुखार था। इसलिए नहीं आ पाई। आज कुछ ठीक था तो आ गई।" ...