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चुभन

" मॉम मैं जा रहा हूँ। बाय। " दरवाजा खुला और वो बाहर चला गया। उसका बैकपैक और लाल जैकेट दिखाई दिया।
शैला की आँख खुल गई। वह उठ कर बैठ गई। सुबह के छह बजे थे। अखिल सोये हुए थे।  कल रात भी देर से आये। काम का बोझ बहुत बढ़ गया है। वह पूरे एहतियात के साथ उठी ताकी अखिल की  नींद न टूट जाए।
तैयार होकर वह हाथ में चाय का प्याला पकड़े बालकनी में आ गयी।  यूनिफार्म पहने स्कूल जाते बच्चों को देखने लगी। पीछे से आकर अखिल ने धीरे से उसका कंधा पकड़ा। दोनों ने एक दूसरे को देखा और आँखों ही आँखों में दिल का दर्द समझ लिया।
" उठ गए आप, कल भी बहुत देर हो गयी "
" हाँ आजकल काम बहुत बढ़ गया है। आज भी मुझे जल्दी निकलना है। एक मीटिंग है। "
" ठीक है आप तैयार हों मैं नाश्ता बनाती हूँ। " कहकर शैला रसोई में चली गयी।
अखिल के जाने के बाद शैला ने अपना पर्स उठाया, एक बार खुद को आईने में देखा और बाहर निकल गई।
ट्राफिक बहुत ज़यादा था। सिग्नल पर जाम लगा था। आटो बहुत धीरे धीरे बढ़ रहा था। शैला यादों के गलियारे में भटकने लगी।
" मॉम मुझे दोस्तों के साथ मैच खेलने जाना है।"
" नहीं आज तुम्हारी अमेरिका वाली बुआ लंच पर आ रही हैं।  तुम नहीं होगे तो पापा गुस्सा होंगे।"
" मॉम मैं वादा करता हूँ जल्दी लौट आऊँगा। प्लीज जाने दो।"
शैला बहुत व्यस्त थी। एक लम्बे अर्से के बाद उसकी ननद भारत आई थी। अपने व्यस्त कार्यक्रम से वक़्त निकाल कर वह लंच पर उनके घर आ रही थी। वह कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती थी। वह जानती थी कि जब तक वह इज़ाज़त नहीं देगी तब तक वह पीछे पड़ा रहेगा। अतः उसे मानना ही पड़ा।
" ठीक है पर देर मत करना" शैला ने काम करते  हुए जवाब दिया।
 " मॉम मैं जा रहा हूँ। बाय" शैला ने किचन के दरवाज़े से झाँका। उसे केवल लाल जैकेट दिखाई दिया। वह बाहर जा चुका था।
उसके बाद कभी उसने अपने बेटे को जीवित नहीं देखा। आज भी उसके दिल में इस बात की चुभन है कि वह जाते समय उसका मुख भी न देख सकी।
ऑटो एक भवन के सामने  आकर रुक गया। पैसे चुका कर वह तेज़ कदमों से भीतर चली गई। भीतर एक बड़े से कमरे में छोटे छोटे बच्चे बैठे थे। उसे देखते ही एक स्वर में बोल पड़े " गुडमार्निंग मैम"
इन गरीब और अनाथ बच्चों के साथ कुछ समय व्यतीत कर वह अपना दुःख भूल जाती है।




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