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छोटी बेगम

नवाब साहब की हवेली में बहुत चहल पहल थी।  आज नवाब साहब अपनी नई बेगम को विदा करा कर ला रहे थे। हवेली भी दुल्हन की तरह सजी थी। सभी अपने अपने काम में लगे थे।

दिलरुबा भी अपने काम में लगा था। किंतु आज उसका मन कुछ उदास था। अब तक वह बड़ी बेगम की ख़िदमत में था। अब उसे छोटी बेगम के हुज़ूर में रहने का हुक्म मिला है। बड़ी बेगम के निक़ाह के वक्त वह उनके साथ इस हवेली में आया था। तब से उनकी ही सेवा कर रहा था। हालाँकि उसके जैसे ख्वाजसरा का काम तो खिदमत करना  था। चाहें बेगम कोई भी हो।

उसकी उदासी का कारण कुछ और ही था। आज उसे अपने पिछले जीवन की याद आ रही थी। उन अपनों की जो वक़्त के बहाव में कहीं खो गए थे।

अजय का गौना हुए तीन माह बीत चुके थे। उसकी पत्नी लक्ष्मी बेहद खूबसूरत थी। उसे अपने रंग रूप पर बहुत गुमान था। अजय से अपने नख़रे उठवाना उसे बहुत अच्छा लगता था। दरअसल अजय के नाक नक़्श स्त्रियों की भांति थे। उसके हाव भाव में एक स्त्री सुलभ कोमलता थी। अतः अपने मित्रों के बीच अक्सर वह उपहास का पात्र बनता था। किंतु अपनी स्त्री के सम्मुख वह किसी भी प्रकार कम नहीं पड़ना चाहता था। इसीलिए उसके हर नख़रे उठाता था।

आम के पेड़ों पर कच्चे आम आ गए थे। ऐसे में एक दिन लक्ष्मी ने अमिया की चटनी खाने की इच्छा ज़ाहिर की। अजय बोला " अरे ये कौन सी बड़ी बात है, आज कल तो चारों तरफ आम ही आम दिखाई दे रहे हैं। अपने आँगन में भी आम का पेड़ है। मैं अभी तोड़ कर देता हूँ। "

लक्ष्मी अर्थपूर्ण तरीके से मुस्कुराते हुए बोली " बात इतनी सी नहीं है। मुझे चटनी तो खानी है पर उन आमों की जो नवाब साहब के बाग़ से तोड़े गए हों। "

अजय समझ गया वह सिर्फ उसे परेशान करने के लिए ही यह सब कह रही है। उसे इस तरह उलझन में देख लक्ष्मी ने अपनी आँखें मटकाते हुए उसे चुनौती दी " सोंच लो अगर कर पाओ तो। "

उसके इस व्यवहार से अजय के पौरुष को ठेस पहुंची। वह किसी भी कीमत पर उसके सामने हार नहीं मानना चाहता था। उसे पता था कि नवाब साहब के बाग़ में घुसना आसान नहीं था। किंतु फिर भी वह जाने को तैयार हो गया। किंतु जैसा डर था वही हुआ। नवाब साहब के कारिंदों ने उसे पकड़ लिया और उनके सामने पेश कर दिया।

नवाब साहब ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा फिर उसे हवेली के पीछे के हिस्से में क़ैद करने का हुक्म दिया। कुछ दिन तक उसे नवाब साहब कि खिदमत में पेश किया गया। फिर उनका मन भर जाने पर उसे एक नए  जीवन मैं ढकेल दिया गया। अब वह न स्त्री था न पुरूष। इस नई पहचान के साथ उसे नया नाम मिला दिलरुबा।

उसे नवाब साहब की बेटी की खिदमत में लगा दिया गया। उनके विवाह के बाद वह उनकी ससुराल आ गया। तब से बड़ी बेगम की ख़िदमत मे था।

अचानक हलचल उठी। छोटी बेगम विदा होकर आ गई थीं। रस्म अदायगी के बाद वह ज़नानख़ाने में चली गईं। नवाब साहब अपने दोस्तों के साथ संगीत की महफ़िल में शामिल हो गए।

दिलरुबा नई बेगम को सलाम करने उनके कमरे में गया। छोटी बेगम ने अपना घूँघट हटाया " उफ़्फ़ , अल्लाह कितनी गरमी है। जाओ हमारे लिए एक गिलास शरबत लेकर आओ। "

उनका चेहरा देखकर दिलरुबा आवाक रह गया। ' लक्ष्मी' उसके मुँह से निकलने ही वाला था कि छोटी बेगम ने गुस्से से झिड़का " बहरे हो सुनते नहीं, हमारे लिए शरबत लाओ। "

तकदीर ने कैसा क्रूर मजाक किया था उसके साथ। अपनी ही ब्याहता के सामने वह एक नपुंसक की तरह खड़ा था। इस अन्याय के लिए वह कुछ बोल भी नहीं सकता था। सिर्फ इतना ही कह सका " अभी लाया छोटी बेगम।"

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