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परवाज़

मिसेज़ सेठ ने उसे उसका कमरा दिखाया। गायत्री ने कमरे को ध्यान से देखा। कमरे में एक बेड, एक अलमारी और एक राइटिंग डेस्क थी। कमरे की खिड़की घर के गार्डन में खुलती थी। ताज़ी हवा के साथ साथ अच्छा नज़ारा भी मिल रहा था। मिसेज़ सेठ जाते हुए बोल गईं कि नौ बजे तक ब्रेकफ़ास्ट के लिए नीचे आ जाना। गायत्री खिड़की पर आकर खड़ी हो गई। आज से उसकी ज़िंदगी की नई शुरुआत हो रही थी। अब वह अपने दम पर अपनी शर्तों के हिसाब से जियेगी।

जब पहली बार उसने माँ को अपना निर्णय सुनाया तो उन्होंने इसका विरोध किया।

" ये कैसी बात कर रही हो तुम । कहीं पति पत्नी का रिश्ता भी टूटता है। पागल मत बन। धैर्य रख समय के साथ सब ठीक हो जायेगा। " माँ ने उसे समझाया

उसने एक प्रश्न भरी नज़र  माँ पर डाली " तुमने भी तो पैंतीस वर्ष धैर्य रखा न, क्या मिला। समय के साथ कुछ नहीं बदला बस तुमने सब कुछ चुपचाप सहने की आदत डाल ली है। "

माँ कुछ बोल नहीं पाईं। उन्होंने बस सजल नेत्रों से गायत्री को देखा। गायत्री उनका दिल नहीं दुखना चाहती थी। उसे अपनी गलती का आभास हुआ।  वह बोली " सॉरी माँ मैंने तुम्हारा दिल दुखाया।  लेकिन अब और नहीं सहा जाता है। "

" अपनी गृहस्ती के लिए औरत को कई तकलीफें सहनी पड़ती हैं। "

" जानती हूँ। बात अगर तकलीफों की होती तो मैं हंस कर झेल लेती लेकिन मेरे आत्मसम्मान पर रोज़ रोज़ पड़ने वाली चोट बर्दाश्त नहीं होती है। "

" तुम्हारे पापा कभी इस फैसले को नहीं मानेंगे। बाकी जो तुम्हारी मर्ज़ी हो करो। " माँ ने अपना फैसला सुना दिया।

पापा ने उसका रिश्ता तय किया था। शादी से पहले वह रस्मी तौर पर राकेश से मिली थी। पहली मुलाकात में वह उसे एक बहुत सुलझा हुआ और खुले विचारों वाला व्यक्ति प्रतीत हुआ। उसे गायत्री के  नौकरी करने से भी कोई ऐतराज़ नहीं था। वह बहुत खुश हुई थी कि उसे वह सब नहीं सहना पड़ेगा जो उसकी माँ ने सहा था।  राकेश के साथ एक सुखद भविष्य के सपने देखने लगी। किंतु शादी के बाद राकेश का एक अलग ही रूप सामने आया। बात बात पर उसे ताने देना, उसका अपमान करना।  अक्सर वह उस पर हाथ भी उठाता था।  उसके लिए गायत्री का वज़ूद जिस्म के कुछ ख़ास हिस्सों तक ही सीमित था। राकेश ने उसकी नौकरी भी छुड़वा दी।

अपनी माँ के दिए गए संस्कारों के कारण उसने सोंचा कि शायद उसके प्रेम और सेवा से राकेश का मन बदल जाए। किंतु जितना वह प्रयास करती उतना ही राकेश उस पर अत्याचार करता। उसके सारे प्रयास बेकार गए।

एक छोटी सी चिंगारी ही दावानल बन जाती है। इसी तरह एक घटना ने उसे उसके निर्णय पर पहुँचा दिया। उसकी एक पुरानी सहेली ने साड़ियों का इम्पोरियम खोला था। उसके उदघाटन पर उसने गायत्री को आमंत्रित किया। सभी साड़ियां खरीद रहे थे। उसने भी अपने लिए एक साड़ी ख़रीद ली। शाम को उसने वह साड़ी राकेश के सामने लाकर रख दी " कैसी है ?"

राकेश ने साड़ी की तरफ नज़र डाली और पूँछा " कहाँ से आई ? "

" वो मेरी एक सहेली ने साड़ी इम्पोरियम खोला है।  आज उदघाटन पर बुलाया था। सब खरीद रहे थे तो मैंने भी एक साड़ी ले ली। "

राकेश ने उसे घूरा " कुछ अक्ल है तुम्हें, सब खरीद रहे थे इसलिए तुमने भी खरीद ली। वाह क्या बात है। पैसे तो पेड़ पर उगते हैं। कमाना पड़े तो पता चले।  पर तुमने बिना सोंचे रुपये उड़ा दिए। "

गायत्री को बुरा लगा " ये क्या कह रहे हैं आप। मैं तो हमेशा सोंच समझ कर ख़र्च करती हूँ। कुछ पैसे बचाये थे उन्हीं से ये साड़ी खरीदी है। वैसे भी बहुत दिन हुए मुझे अपने लिए कुछ खरीदे। "

राकेश और चिढ़ गया। साड़ी को उलट पलट कर देखा " न रंग की समझ है न डिज़ाइन की बस उठा लाईं। " यह कह कर उसने साड़ी गायत्री के मुंह पर फ़ेंक दी।

इस अपमान से गायत्री को बहुत धक्का लगा। उसकी आँखों से आंसू निकलने लगे। राकेश इतने पर भी शांत नहीं हुआ " यहाँ बैठ कर आंसू मत बहाओ। मुझे ये हरकतें सख़्त नपसंद हैं। "

गायत्री तिलमिला उठी और भाग कर कमरे में चली गई। उसे अब अपने ऊपर क्रोध आ रहा था। वह अब तक क्यों अपमान सहती रही। उसे समझ जाना चाहिए था कि राकेश बदलने वालों में नहीं है। उसने तय किया कि वह अब और नहीं सहेगी। अगले दिन ही वह माँ के घर चली गई।

उसके पास कुछ गहने थे और जब वह नौकरी करती थी उस समय की कुछ बचत। जिससे वह जब तक कोई नौकरी न मिले कुछ महीने काम चला सकती थी। उसकी सहेली सुमन ने उसे दिल्ली चले आने को कहा। उसके दफ्तर में एक जगह थी। और भी कई जगह उसकी जान पहचान थी। उसी ने मिसेज़ सेठ से उसकी बात कराई जहाँ वह पी. जी. के तौर पर रहती थी।

जब उसने अपना फैसला पापा को सुनाया तो उन्होंने माँ को सरोष नेत्रों से देखते हुए व्यंग किया " तुम्हारी परवरिश से और क्या उम्मीद की जा सकती है। " फिर गायत्री को देख कर बोले " अभी सब आसानी से मिल रहा है इसीलिए सब हरा हरा सूझ रहा है। जब बाहर धक्के खाओगी तो चार इन में होश ठिकाने आ जायेंगे। फिर रोती हुई मेरे पास मत आना। "

" चाहें कुछ भी हो जाए मैं लौट कर यहाँ नहीं आऊँगी। " गायत्री ने अपना फैसला सुना दिया।

सुबह की चमकीली धूप गार्डन में फ़ैली थी। गायत्री ने देखा की चिड़िया का एक बच्चा गार्डन में फुदक रहा है।  शायद वह अपने घोंसले से नीचे गिर पड़ा था। वह बार बार अपने पंख फड़फड़ाता और कुछ ऊपर तक उड़ता।  वह अपने पर तौल रहा था एक ऊंची परवाज़ के लिए। गायत्री को आज इंटरव्यू के लिए जाना था। वह तैयार होने लगी।

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