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आग

मदन रूपवान और धनवान था। अभी कुछ समय पूर्व ही उसने यौवन में कदम रखा था। उसे अपने पुरुष होने का अभिमान था।
कालेज के प्रथम वर्ष का प्रारम्भ हुआ था। कोएड कालेज में पढने वाली लड़कियां उसके लिए रूप और यौवन से भरे पात्र के अतिरिक्त कुछ नहीं थीं जिन्हें वह पी जाना चाहता था। इन्हीं में एक थी कामिनी। उसके रूप के आगे सभी की चमक फीकी पड़ जाती थी। मदन ने उस पर अपना प्रभाव डाल कर उसे अपनी तरफ आकर्षित कर लिया। उसे एक सहृदय मित्र समझकर कामिनी उसके साथ खुल कर व्यवहार करती थी। किंतु अवसर पाकर मदन ने उसके इस खुले व्यवहार का फायदा उठाया। अपनी तृप्ति कर वह एक भ्रमर की भांति दूसरे फूलों पर मंडराने लगा। अपनी पहली कामयाबी से उसका अभिमान और बढ़ गया। उसके लिए सभी स्त्रियां केवल मन बहलाव का सामान बन गईं।
कालेज के बाद उसने अपने पैतृक व्यापार को ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया। इससे उसकी मान प्रतिष्ठा और बढ़ गई। उसका अभिमान पहले से और बढ़ गया। उसके संपर्क में आने वाली स्त्रियों को कभी उनकी मज़बूरी का फायदा उठाकर तो कभी लालच देकर अपनी उस वासना को शांत करने की कोशिश करता जो और अधिक बढती जाती थी। उसकी सुंदर सुशील पत्नी भी उसके लिए केवल उसी वासना की पूर्ती का साधन थी।
समय बीतता गया और समाज में उसका रुतबा बढ़ता गया। समाज के नामी लोगों में उसकी गिनती होती थी। सभी उसे सम्मान की दृष्टि से देखते थे। अब उसके पास एक भरा पूरा परिवार था। सभी उसे प्रेम और सम्मान देते थे। मदन का स्वास्थ अब कुछ ठीक नहीं रहता था। अतः व्यापार का भार उसने अगली पीढ़ी को सौंप दिया था। किंतु उसके मन में जल रही वासना की आग अभी भी धधक रही थी।
उसकी पोती उसे बहुत प्रिय थी। इन छुट्टियों में वह अपनी सखी के साथ हॉस्टल से घर आई हुई थी। सखी का नाम सौंदर्या था। वह शोख़ और चंचल थी। उसकी चंचलता ने मदन के भीतर की उस आग को और भड़का दिया। एक दिन सभी किसी उत्सव में गए थे। सौंदर्या अस्वस्थ होने के कारण घर पर ही थी।
मदन के भीतर की आग उसे धकेल रही थी। अपने आप को विवश पाकर वह सारी मर्यादाओं को भूलकर उसके कमरे में चला गया। उसके हाथ उस बच्ची की तरफ बढे। वह चीख पड़ी। ठीक उसी समय उसकी पोती ने कमरे में प्रवेश किया। अपने दादा को इस रूप में देखकर उसने नफ़रत से अपना मुहं घुमा लिया।
एक पल में ही वर्षों से बनाई उसकी प्रतिष्ठा चूर चूर हो गई।  वह भी उसकी प्रिय पोती के सामने। वासना के दलदल में वह गले तक डूब गया था। वह आग को घी डाल कर बुझाने का प्रयास कर रहा था। आज उसका सारा अभिमान मिटटी में मिल गया था। स्वयं के वजूद से उसे नफ़रत हो रही थी।



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