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गट्टू बाबू

बचपन में एक खिलौना देखा था। मिट्टी के एक बड़े से गोले पर स्प्रिंग से जुड़ा हुआ एक छोटा गोला। बड़े गोले पर रंग से हाथ पैर बने थे। छोटा गोला सर था। बस कुछ इसी तरह दिखते हैं गट्टू बाबू। विशाल गोलाकार शरीर और उस पर इधर उधर हिलती उनकी मुंडी।
गट्टू बाबू की दो प्रेमिकाएं हैं। एक उनकी जीभ। जिसे वे जितना अधिक रसास्वादन कराते हैं वह उतनी ही अधिक अतृप्त रहती है। दूसरी है निद्रा। जो अक्सर दबे पांव आकर उन्हें अपने आलिंगन में बाँध लेती है। अपने खाकर आसानी से पचा लेने के गुण के कारण वो दूर दूर तक मशहूर हैं। उनके इस गुण की सर्वोत्तम व्याख्या उनके साढ़ू चुन्नी लाल इस तरह से करते हैं की यदि संसार भर की खाद्य सामग्री एकत्रित कर गट्टू बाबू को परोसी जाए तो मिनटों में वह उनके उदर के किस कोने में समा जायेगी कोई नहीं बता सकता है। इस पर भी गट्टू बाबू बिना डकारे थोड़ा और मिलेगा क्या ? के भाव से निहारते नज़र आएंगे। लोग उन्हें दावत में नहीं बुलाते हैं। अकेले एक बारात का खाना तो वही खा जाएंगे।
खा खा कर उनका शरीर किसी बड़े से भण्डारगृह की भांति हो गया है। हाथ पांव चलना बहुत कठिन  लगता है। शरीर पर बैठी मक्खी उड़ाना पहाड़ ठेलने से कम नहीं। अतः अधिकांश समय खिड़की के पास पड़े पलंग पर बीतता है। वहां से जितना दिखता है वही उनकी दुनिया है। डाक्टरों ने सख्त हिदायत दी है कि जैसे ब्रह्मचारी के लिए काम का चिंतन भी वर्जित है वैसे ही आप तले भुने पदार्थों से दूरी रखें। अतः जब तक जागते हैं तब आस पास से उठते मसालों की खुशबू से क्या पक रहा है का अनुमान लगाते हैं। जब सो रहे होते हैं तो भांति भांति के व्यंजनों के स्वप्न देखते हैं। अब तो खाने को इतना ही मिलता है की ऊँट के मुह में जीरा वाली कहावत भी शर्मा जाए। अतः वह ईश्वर को कोसते हैं कि ये क्या कर दिया। भला यह भी कोई जीवन है जहां तला भुना खाने को भी ना मिले। इससे तो बेहतर मौत है।
परसों ईश्वर ने उनकी सुन ली। दरअसल शहर में पिछले हफ्ते एक अधिवेशन हुआ जहाँ खाद्य समस्या पर बड़े बड़े लोगों ने व्याख्यान दिए। खाद्य संकट के कारणों पर विचार हुआ। कुछ लोगों ने गट्टू बाबू का नाम भी लिया। अब गट्टू बाबू की तकलीफ देख कर या खाद्य संकट पर विचार कर ईश्वर का दिल पसीज गया। गट्टू बाबू जब अपनी दूसरी प्रेमिका के आगोश में गए तो चिरनिद्रा में लीन हो गए।
मोहल्ले में सब चिंतित थे कि इन्हें शमशान कैसे ले जायें। खैर वो समस्या हल हो गई और सर्वभक्षिणी अग्नि उन्हें भी लील गई। तेरह दिन के बाद तेरहवीं का आयोजन हुआ। शहर के मशहूर हलवाई ने बेहतरीन व्यंजन बनाए। सबने छककर उनका स्वाद लिया और गट्टू बाबू की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की।
लेकिन जहाँ लोग तरह तरह के व्यंजनो का लुत्फ़ ले रहे हों वहाँ गट्टू बाबू की आत्मा को शांति कहाँ थी।
वह तो वहीं भटक रही थी।

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