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मुक्ति

नौ द्वारों वाला एक घर था। इस घर पर सात असुर भाइयों का कब्ज़ा था। इन्होने गृहस्वामी को अपना दास बना रखा था। सब उसे अपने इशारों पर नचाते थे।
सबसे बड़े असुर का नाम हवस था। वह जितना भी भोग करता उतना ही और विकराल हो जाता था।   उसकी तृप्ति के लिए गृहस्वामी इधर उधर भटकता फिरता था। किंतु  उसकी तृप्ति किसी भी प्रकार नहीं होती थी।
दूसरे असुर का नाम लोलुपता था। अधिकाधिक भक्षण उसकी आदत थी। उसका प्रेमिका थी जीभ। उसके वशीभूत वह नाना प्रकार के व्यंजनों का स्वाद लेता था किन्तु उसकी यह प्रेमिका सदैव नए स्वाद के लिए आतुर रहती थी।
तीसरे असुर को ज़्यादा से ज़्यादा संग्रह करने की आदत थी। उसका खज़ाना जितना बढ़ता उसे उतना ही कम लगता था।
अभिमान नामक असुर सदैव गर्व से दहाड़ता रहता था।
आालस क्रोध ईर्ष्या ये अक्सर उसे अपनी गिरफ्त में लिए रहते थे। गृहस्वामी इनसे बहुत परेशान था वह मुक्ति चाहता था। उसके पास अपार शक्ति थी किंतु इन असुरों की दासता करते हुए वह उसे भूल गया था। अतः एक दिन जब वह बहुत व्याकुल था उसने इन असुरों से मुक्ति पाने का प्राण किया और तप करने बैठ गया। कठोर तपस्या से उसके ज्ञान चक्षु खुल गए। उसे अपनी शक्ति का भान हो गया। इन सात असुरों से लड़ने के लिए सात दैवीय शक्तियां उसके भीतर थीं। उसने बारी बारी से इनका प्रयोग करने का निश्चय किया।
हवस नामक असुर के लिए उसने संयम नाम की दैवीय शक्ति का आवाहन किया। हवस जब भोग के लिए आतुर होता संयम उसे रोकता।  धीरे धीरे हवस संयम के आगे शिथिल पड़ने लगा और हार गया।
लोलुपता नामक असुर को उसने नियंत्रण से हरा दिया। लालच को संतोष से वश में कर लिया। इसी प्रकार अभिमान पर विनम्रता से, आलस्य पर कर्म से, ईर्ष्या पर उदारता  एवं क्रोध पर प्रेम से विजय पाई। अब वह मुक्त था। भवन के नौ द्वारों से प्रकाश फूट रहा था।

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