सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

प्रियतम

रूपमती महल के झरोखे पर बैठी नर्मदा को निहार रही थी। साँझ ढल रही थी।  मन बहुत  व्यथित था। बाज़ बहादुर मुग़लों से हार कर रण छोड़ कर भाग गया था। किसी भी समय अधम ख़ान महल में प्रवेश कर सकता था।
डूबते हुए सूरज को देखकर रूपमती का ह्रदय भी डूब रहा था। एक प्रश्न उसके ह्रदय को विदीर्ण कर रहा था। क्या एक बार भी बाज़ बहादुर को उसका ख़याल नहीं आया। उसने एक बार भी नहीं सोंचा की उसके बाद उसकी प्रिय रानी रूपमती पर क्या बीतेगी। कैसे वह उस अधम ख़ान से ख़ुद की रक्षा करेगी।
नर्मदा माँ उन दोनों के प्रेम की गवाह है। इनके तट पर न जाने कितनी ही शामें उसने और बाज़ बहादुर ने साथ बिताई हैं। कभी संगीत के स्वरों के साथ तो कभी एक दूसरे का हाथ थामे मौन सिर्फ नर्मदा की बहती धारा को देखते हुए।
उसके मन में एक टीस सी उठी। कहाँ होगा उस का प्रियतम। क्या बीत रही होगी उस पर। भूखा प्यासा  जाने कहाँ भटकता होगा। उसके मन में फिर एक प्रश्न उठा ' क्या वह भी उसके बारे में इसी प्रकार चिंतित होगा। ' नियति उन दोनों के प्रेम की यह कैसी परीक्षा ले रही है। अपने प्रियतम के बिना जीना उसके लिए कठिन है। पता नहीं अब जीवन में दुबारा मिलना होगा या नहीं। इसकी संभावना नहीं लगती है। दुष्ट अधम ख़ान किसी भी समय महल में दाख़िल हो जाएगा। क्या करेगी वो। कैसे अपनी रक्षा करेगी।
अधम ख़ान के पदचाप सुनाई देने लगे थे। कुछ ही देर में वह अन्तःपुर में प्रवेश कर जाएगा। उसका तन मन सब बाज़ बहादुर का है।  उसके प्रेम पर तो अधम ख़ान कभी भी अधिकार नहीं कर सकता है। किंतु उसके जीवित रहते वह उसके शरीर का भी स्पर्श नहीं कर पायेगा। वो एक क्षत्राणी है। उसे जीतने नहीं देगी। उसने अपने प्रियतम को अंतिम बार याद किया और विष पी लिया।
अधम ख़ान आया तो रूपमती की मृत देह ही उसे मिली। उसके अप्रतिम सौंदर्य पर वह मुग्ध हो गया। उसके चहरे पर आत्मसम्मान की भावना अभी भी देखी जा सकती थी। अपने प्रेम के प्रति उसका समर्पण एवं सतीत्व की रक्षा हेतु उसका आत्मोत्सर्ग देख कर अधम ख़ान के मन में श्रद्धा का भाव जाग उठा। उसने सैनिकों को आदेश दिया कि रूपमती का यथोचित अंतिम संस्कार किया जाए।
http://www.tumbhi.com/writing/short-stories/priyatam/ashish-trivedi/60348#.VdVbLqVifzo.facebook




टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

मुसाफिर

कल रात अचानक ही बंसल साहब का निधन हो गया। मोहल्ले में जब यह समाचार फैला तो लोग उन्हें अंतिम विदाई देने उनके घर पर एकत्र हुए। अर्थी निकलने की तैयारी हो रही थी। मोहल्ले के दो बुज़र्ग खन्ना जी और पांडे जी बाहर बैठे बात कर रहे थे। "अरे यह तो सबके साथ होना है। हम सब तो मुसाफिर हैं। ना जाने कब स्टेशन आ जाए और उतरना पड़े।" पांडे जी ने दार्शनिक अंदाज़ में कहा। "सही कहा पांडे जी। लेकिन तब भी इंसान माया में फंसा रहता है।" "सुना है बंसल किसी केस में फंसा था। पेंशन अटकी हुई थी।" "अजी जुगाड़ू बंदा था। ऊपर तक पहुँच थी। सब क्लियर हो गया।" खन्ना जी ने रहस्य खोला। "क्या लाभ ऐसे पैसे का। मरने पर इकलौता बेटा भी साथ नही है।"  "सही कहा पांडे जी। अब बेचारी मिसेज बंसल अकेली पड़ गईं।" "अब यह तो सबके साथ है। इस उम्र में जीवनसाथी का ही सहारा होता है।" "बिल्कुल सही। भाभी जी कैसी हैं।" "बेटे बहू के लिए हुड़कती रहती हैं।" "तो शेखर के पास क्यों नही चले जाते।" "उनकी अपनी जिंदगी है। दोनों वर्किंग हैं। वहाँ भी दिन...

भूचाल

लाला हरबंसलाल अपनी पुशतैनी हवेली के आंगन में बैठे थे. जो सामान ले जाया जा सकता था वह गठरियों में बंधा रखा था. उस पर एक नजर डाल कर उन्होंने गहरी सांस ली.  आंगन में गौरैया रोज़ की तरह फुदक रही थी. मुंडेर पर बैठा कौवा भी वैसे ही कांव कांव कर रहा था. प्रकृति का हर काम वैसे ही चल रहा था. कहीं कोई उथल पुथल नही थी सिवाय इंसानी ज़िदगी के. इंसानों के जीवन में भूचाल आया था. मजहब के नाम पर मुल्क दो हिस्सों में बंट गया था. इस बंटवारे ने बहुतों को उनकी जड़ों से अलग कर दिया था.

केंद्र बिंदु

पारस देख रहा था कि आरव का मन खाने से अधिक अपने फोन पर था। वह बार बार मैसेज चेक कर रहा था। सिर्फ दो रोटी खाकर वह प्लेट किचन में रखने के लिए उठा तो पारस ने टोंक दिया। "खाना तो ढंग से खाओ। जल्दी किस बात की है तुम्हें।" "बस पापा मेरा पेट भर गया।" कहते हुए वह प्लेट किचन में रख अपने कमरे में चला गया। पारस का मन भी खाने से उचट गया। उसने प्लेट की रोटी खत्म की और प्लेट किचन में रख आया। बचा हुआ खाना फ्रिज में रख कर वह भी अपने कमरे में चला गया। लैपटॉप खोल कर वह ऑफिस का काम करने लगा। पर काम में उसका मन नही लग रहा था। वह आरव के विषय में सोच रहा था। उसने महसूस किया था कि पिछले कुछ महीनों में आरव के बर्ताव में बहुत परिवर्तन आ गया है। पहले डिनर का समय खाने के साथ साथ आपसी बातचीत का भी होता था। आरव उसे स्कूल में क्या हुआ इसका पूरा ब्यौरा देता था। किंतु जबसे उसने कॉलेज जाना शुरू किया है तब से बहुत कम बात करता है। इधर कुछ दिनों से तो उसका ध्यान ही जैसे घर में नही रहता था। पारस सोचने लगा। उम्र का तकाज़ा है। उन्नीस साल का हो गया है अब वह। नए दोस्त नया माहौल इस सब में उसने अपनी अलग दुनि...