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आस

उसके पति की अर्थी अभी उठी ही थी कि उसके आंगन में मजमा लगना शुरू हो गया. टीवी वाले, अखबार वाले, समाज सेवक तथा नेता सभी जुट रहे थे. हर आंख नम थी. शब्दों में संवेदना थी. सभी उसे मदद का आश्वासन दे रहे थे. उसके पीड़ित मन को तसल्ली मिल रही थी. मदद मिलने की आस उसके जखमों पर मरहम का काम कर रही थी. निश्चिंत थी कि उसके बच्चों का भविष्य अब सुरक्षित रहेगा.
समय के साथ सारी भीड़ छंट गई. अब कोई नही आता. अब वह अपने भूखे बच्चों के चेहरे देखती है और अपनी बुझती आस का दिया जलाए रखने का प्रयास करती है.


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