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हुनर

 

   हुनर


अभी सूरज उगने में समय था। मंजुला आज जल्दी जाग गई थी। बल्की सच तो यह था कि रात भर सोई ही नहीं थी। भविष्य की चिंता ने उसे सोने ही नहीं दिया था। जब उसने अपने बगल में सोए दो साल के अपने बेटे को सोते देखा तो उसकी नींद आँखों से गायब हो गई।


कोरोना ने पहले उसके पति का रोज़गार चौपट कर दिया था। उसके बाद उसके शरीर में घुसकर प्राण निकाल लिए। इस समय ना पति था और ना ही पैसे। जो जमा पूंजी थी खर्च हो गई थी। समझ नहीं आ रहा था कि आगे क्या करेगी। 

वह उठकर दूसरे कमरे में गई। कोने में रखी हुई सिलाई मशीन पर नज़र पड़ी। उसने घर के पास एक सरकारी सेंटर से सिलाई का कोर्स किया था। कपड़े डिज़ाइन करना सीखा था। तब उसके पति ने यह लेटेस्ट सिलाई मशीन खरीद कर दी थी।

उसके बाद तो समय ने इतनी उथल पुथल मचाई कि सब छूट गया। उसने सिलाई मशीन पर पड़ा कवर हटाया। उसे छूकर देखा। अचानक उसके मन में ‌उम्मीद की किरण जागी। 

कुछ हो ना हो उसका हुनर तो उसके साथ है। उसका बेटा जाग गया था। वह उसके पास गई‌। उसे गोद में उठाकर चूमने लगी। 

खिड़की से बाहर देखा तो सूरज उग रहा था।

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