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मुखिया

 

नीरज को ज़ोर से प्यास लगी थी। अभी उसने दो घूंट पानी ही पिया होगा कि पता चला कि टेंट वाले ने कुर्सियां व गद्दे भिजवाए हैं। जल्दी से पानी पीकर वह सब सामान सही जगह रखवाने के लिए भागा। सुबह से घड़ी भर को भी चैन से नहीं बैठ सका था। कभी किसी का हिसाब करना पड़ता तो कभी काम का मुआयना करना पड़ता। समारोह का सारा दायित्व इस बार उस पर था।

पहले सब बड़े भइया संभालते थे। तब उसे लगता था कि उनका काम कितना आसान है। बस लोगों को आदेश दो और काम पर नज़र बनाए रखो। किंतु आज उसे समझ आ रहा था कि मुखिया होना सबसे कठिन काम है।



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