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संदेश

सच की राह

वकालत के पेशे में ह्रदय नारायण ने अभी पहचान बनानी शुरू ही की थी। पर आज जो केस उन्होंने लिया वह चौंकाने वाला था। "सर आपने यह केस क्यों लिया। हारने के बहुत चांस हैं।" उनके सहायक ने सवाल किया। "मुझे उस बूढ़े की आँखों में सच्चाई नज़र आई।"  "लेकिन अदालत सबूत और गवाह के आधार पर फैसला देती है। जिसके खिलाफ आप लड़ने वाले हैं वह बहुत रसूख़दार हैं।" सहायक ने अपनी दलील दी। ह्रदय नारायण कुछ देर सोंच कर बोले "बचपन से पढ़ा है कि सच हमेशा जीतता है। फिर भी हर कोई झूठ का सहारा लेता है। क्योंकी सच की राह कठिन है।" ह्रदय नारायण ने अपने सहायक पर नज़रें टिका कर दृढ़ता से कहा "मैं कठिन राह पर चल कर यह साबित करूँगा कि सच हमेशा जीतता है।"

घुड़चढ़ी

सॉफ्टवेयर इंजीनियर महेंद्र आज दूल्हा बना था। दरवाज़े पर बैंड बाजा बज रहा था। बरात के निकास की तैयारी हो रही थी। बारात विदा हुई। नाचते गाते बाराती पास के मोहल्ले में लड़की के दरवाज़े की तरफ बढ़े।  घोड़ी पर बैठा महेंद्र आने वाले जीवन के सुखद स्वप्न देख रहा था। थोड़ी ही दूर पर बरात रुक गई। हंगामे के बीच महेंद्र को घोड़ी से उतार दिया गया। सॉफ्टवेयर इंजीनियर को समाज के कुछ लोगों ने घोड़ी चढ़ने का अधिकार नहीं दिया था।

मुकाम

कवि उपेंद्र 'मनचला' ने मंच संभाला और अपनी वही पुरानी कविताएं सुनानी आरंभ कीं। हर कविता के बाद करतल ध्वनि से उनका स्वागत हो रहा था। जहाँ भी वह जाते अपनी इन्हीं कविताओं का पिटारा खोल देते। किंतु फिर वह हर जगह उन्हें प्रशंसा मिलती थीं। अतः उन्होंने कई दिनों से कुछ नया लिखा भी नहीं था। उनके बाद एक नवोदित कवियत्री मंच पर आई। आरंभ में तो लोगों ने औपचारिकता वश तालियां बजाईं। बाद में जैसे जैसे कविता पाठ आगे बढ़ा लोगों में उत्साह आ गया। विचारों का नयापन व शब्दों का अचूक चुनाव सुनने योग्य था। करतल ध्वनि से संपूर्ण पंडाल हिल गया। उपेंद्र 'मनचला' को अपना आसन डोलता लगा।

रक्त संगम

रुग्ण माँ शय्या पर लेटी थी। कांतिहीन शरीर पीला पड़ गया था। सभी परेशान थे। वैद्य ने बताया कि रोगाणु इनकी सारी शक्ति हर ले रहे हैं। एक ही उपाय है। यदि विभिन्न प्रकार के रक्त को एकत्र कर माँ को समर्पित किया जाए तो माँ की कांति वापस आ सकती है। विभिन्न रक्त की बूंदें एक पात्र में एकत्र होने लगीं। शीघ्र ही पात्र भर गया। आपसी वैमनस्य, लालच, भ्रष्टाचार आदि के रोगाणुओं को मात देने का उबाल था उस रक्त में। वह रक्त माँ की शिराओं में ओज बन कर दौड़ने लगा। माँ के चेहरे की रक्तिम कांति लौट आई।

निर्मल मन

टैक्सी से उतर कर कुछ देर आदित्य बाबू असमंजस की स्थिति में खड़े रहे। फिर मन को पक्का कर उन्होंने डोरबेल बजाई। दरवाज़ा खुला तो सामने जीतू खड़ा था। अचानक उन्हें सामने देख कर वह भी अचंभित था। तीस साल के बाद दोनों भाई एक दूसरे को देख रहे थे। ज़मीन के एक टुकड़े ने दिलों में दरार डाल दी थी। छियत्तर वर्ष पूरे कर चुके आदित्य बाबू इस पड़ाव में कोई भी भार रखना नहीं चाहते थे। अतः अहम त्याग कर यहाँ आए थे। बड़े भाई के इस प्रयास को जीतू ने भी बेकार नहीं जाने दिया। बढ़ कर उनके पैर छुए और गले लग गया। भीतर जाने से पहले आसुओं ने दोनों के मन निर्मल कर दिए।

सतरंगी

पेंटिंग्स के शौकीन संजय को जहाँ भी किसी प्रदर्शनी का पता चलता पहुँच जाता। कई कलाकारों ने उसे प्रभावित किया था। लेकिन आज जिस कलाकार की प्रदर्शनी लगी थी उसका काम देख कर वह दंग था। हर कैनवास पर जैसे ज़िंदगी पूरे उत्साह से रंग बिखेर रही थी। हर पेंटिंग जीवन की एक हसीन तस्वीर थी। वह उस कलाकार से मिलने की इच्छा से आयोजक के पास पहुँचा।कुछ ही समय बाद वह कलाकार सबके समक्ष था। चेहरे पर चमकती मुस्कान के साथ। दोनों बाज़ू नहीं थे। अपने पैर में पेन फंसा कर लोगों को ऑटोग्राफ दे रहा था।

काला धुआं

"बीजी स्कूल जा रहा हूँ। आज गणित का पर्चा है।" सुखविंदर ने माँ के पैर छूकर कहा। "ध्यान से पर्चा करना। अच्छे नंबर आने चाहिए।" माँ ने सर पर हाथ फेरा। "आएंगे बीजी, तभी तो पापाजी की तरह सेना में जा पाऊँगा।" उसकी माँ ने दीवार पर लटकी पति की तस्वीर को गर्व से देखा। दही चीनी खिला कर बेटे को विदा करने दरवाज़े तक आई।  सुखविंदर अभी घर का आहता पार कर पाया था कि एक गोला आकर गिरा। काले अंधेरे ने उसकी माँ की आँखों के सामने चादर तान दी।