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विकल्प

रचनाकार: आशीष त्रिवेदी की लघुकथा - विकल्प

मैं कुछ कुछ सामान लेकर लौट रहा था। साथ में मेरी सात वर्ष की बेटी भी थी। एक मकान के सामने भीड़ लगी देख कर मैं  भी कौतुहलवश वहां खड़ा हो गया। अधेड़ उम्र का एक व्यक्ति एक दस बारह साल के बच्चे का कान उमेठ रहा था। लड़का दर्द से चीख रहा था " छोड़ दीजिये अंकल जी अब नहीं करूंगा।" पास खड़े एक अज्जन बोले " अजी एक नंबर का चोर है। इनके घर में घुस कर पेड़ से आम तोड़ रहा था।" मामला समझ कर मैं आगे बढ़ गया। मेरी बेटी ने पूछा " पापा वो अंकल उस बच्चे को क्यों मार रहे थे।" मैंने उसे चोरी करना बुरी बात है यह समझाने के लिहाज़ से कहा " देखो बेटा बिना पूंछे किसी की कोई चीज़ नहीं लेनी चाहिए। उस लड़के ने बिना पूछे उनके पेड़ से आम तोड़े जो गलत है।" कुछ सोंच कर वह बोली " उसे अगर आम खाने थे तो अपने पापा से कहता या जो उसके पास था वही खाता। उसने गलत काम किया।"
उसने तो मासूमियत में कह दिया  'उसके पास जो था वही खाता' किन्तु इस बात ने मेरे दिल में हलचल मचा दी। उसे कैसे समझाता कि दुनियां में कुछ लोगों का आभाव इतना अधिक है कि उनके पास किसी भी विकल्प का आभाव है। बिना कुछ कहे मैं घर की तरफ चल दिया।

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