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वो

कल मैंने उसे फिर देखा। उन सफ़ेद लिली के फूलों के पास जहाँ वह दस माह पूर्व पहली बार दिखाई दी थी।

कई बरस अमेरिका में बिताने के बाद वहां के भाग दौड़ भरे जीवन से मैं थक गया था। अतः  कुछ आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त करने की चाह मुझे मेरे वतन वापस खींच लाई। मैंने इस छोटे से हिल स्टेशन पर यह कॉटेज ले लिया। सैलानियों की आवाजाही न होने से यह जगह बहुत शांत थी। मैं अक्सर ही किसी पहाड़ पर या नदी के किनारे बैठ कर उस परम शक्ति से संबंध स्थापित करने की कोशिश करता था जिसे लोग धार्मिक स्थानों पर ढूँढते हैं।

पहले ही दिन से मुझे यह एहसास हो रहा था की मैं कॉटेज में अकेला नहीं हूँ। पढ़ते समय अक्सर मुझे लगता कि अचानक कोई मेरे पास से गुजर गया या कोई बाहर खिड़की पर खड़ा मुझे घूर रहा है। मैं देखता तो कोई नहीं होता। मैं इसे मन का वहम समझ कर टाल देता।

उस दिन शाम के समय मैं कॉटेज के गार्डन में बैठ कर ध्यान कर रहा था। अचानक मेरी आँख खुली तो देखा की लिली के फूलों के पास वह खड़ी  थी। उसकी निगाह मुझ पर पड़ी। कुछ पल देखती रही फिर अचानक गायब हो गई। मैं सिहर उठा। मैंने वह रात अपने मित्र के घर बिताने का विचार किया। जाने से पहले मेरे मन में एक विचार आया। वह मुझे नुकसान नहीं  पहुँचाना चाहती है। इतने दिनों में उसने मेरा कोई अहित नहीं किया। आज भी बिना कुछ किये ही चली गई। उसे मेरे यहाँ होने से कोई ऐतराज़ नहीं है जब तक मैं उसके क्षेत्र में दखल न दूं। मैं रुक गया।

उसके बाद कई बार वह मुझे दिखाई दी। किन्तु हम दोनों के बीच एक मौन समझौता है। वह जहाँ होती है मैं वहाँ से हट जाता हूँ। वह भी मुझे परेशान नहीं करती है। एक दूसरे को बिना तंग किये हम एक ही कॉटेज में रह रहे हैं।

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