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बंटी दादा

बंटी और दीपू उस बड़े से मकान के पीछे खड़े थे। चाहरदिवारी के पास ही आम का एक पेड़ लगा था। दीवार पर चढ़ कर आसानी से आम तोड़े जा सकते थे।
बंटी ने दीपू से कहा "मैं तुम्हें अपने कंधे पर बैठा लूँगा। तुम तुम मेरे कंधे पर खड़े होकर आसानी से दीवार पर चढ़ सकते हो। फिर तुम आम तोड़ कर मुझे देना। दोनों मिल कर खाएंगे।"
"पर मैं नीचे कैसे उतरूँगा। कहीं कोई आ गया तो।" पाँच साल के दीपू ने मासूमियत से पूंछा।
"जैसे ही कोई आएगा मैं तुम्हें उतार लूँगा। क्या मुझ पर भरोसा नही है।"
दीपू के लिए उसका बंटी दादा किसी हीरो से कम नही था। जब 'छोटा है' कह कर मोहल्ले के बच्चों ने उसे साथ खिलाने से मना कर दिया था। तब बंटी दादा ने ही अपना प्रभाव दिखा कर उसे टीम में शामिल करवाया था। तब से वह उनका मुरीद था।
दीपू फौरन दीवार पर चढ़ने को तैयार हो गया। अभी उसने आम की तरफ हाथ बढ़ाया ही था कि चौकीदार चिल्लाया "कौन बदमाश है। ठहर अभी मज़ा चखाता हूँ।"
दीपू ने पीछे मुड़ कर देखा। आवाज़ सुनते ही बंटी दादा भाग लिए थे। चौकीदार उसे डांट रहा था। वह डरा हुआ था। तभी एक स्नेहिल स्वर सुनाई पड़ा।
"ऐसे मत डांटो। बच्चा है। घबरा कर गिर पड़ा तो।"
चौकीदार ने दीपू को नीचे उतारा। उस स्नेहमूर्ती ने प्यार से समझाया "इस तरह आम तोड़ना सही नही है। अब तुम घर जाओ।"
दीपू सजा से बच गया था। फिर भी आँखों से झार झार आंसू बह रहे थे। उसने विश्वास के टूटने की पीड़ा सही थी। कोमल ह्रदय लहूलुहान था।

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