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थपेड़े

राजू से कुछ ही दूर फुटपाथ पर कुछ और लोग भी बैठे थे। उनकी तरह उसका भी इस शहर में कोई आशियाना नहीं था। 
आज ही वह अपने गांव से भाग कर यहाँ आया था। उसकी बिरादरी के एक आदमी ने बड़े लोगों का कुआं खराब कर दिया था। इसकी सजा सबको भुगतनी पड़ी। उसकी मड़ैया और बूढ़ी दादी इसकी भेंट चढ़ गए। 
पूरे दिन शहर का सम्मोहन उसे आकर्षित करता रहा। सड़क पर दौड़ती गाड़ियां, रंग बिरंगे परिधानों में सजे लोग, ऊंची इमारतें सभी ने मिल कर उसके इर्द गिर्द एक स्वपन संसार का निर्माण कर दिया था। लेकिन भूख की हकीकत अब उसे सपनों की दुनिया से वापस ले आई थी।
वैसे यह सच्चाई तो लगभग रोज़ ही सुरसा की तरह मुंह फाड़ कर खड़ी हो जाती थी। लेकिन तब कम से कम दादी से खाने के लिए मांग तो सकता था। लेकिन अब तो कोई भी नहीं था।
उससे कुछ दूरी पर बैठा एक लड़का दिन भर के बाद कुछ खाने बैठा था। राजू एकटक उसे देख रहा था। दोनों की नज़रें मिलीं तो राजू तुरंत दूसरी तरफ देखने लगा। कुछ देर में उसने अपने कंधे पर एक हाथ महसूस किया। राजू ने देखा वही लड़का था। वह उसके बगल में बैठ गया और खाने का एक हिस्सा राजू की तरफ बढ़ा दिया।
खाना खाकर राजू अपने आपको जीवन के हवाले कर फुटपाथ पर सो गया।

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