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संदेश

नन्हें देशभक्त

  नन्हें देशभक्त  पूरी बिल्डिंग में हलचल थी। बिल्डिंग के छोटे बच्चों ने गणतंत्र दिवस पर तिरंगा यात्रा निकाली थी। सब अपने हाथों में तिरंगा लेकर एक किलोमीटर के दायरे में पैदल चलकर गए थे। बिल्डिंग में रहने वाला यूट्यूबर मानव अपने चैनल के लिए उसका वीडियो बना रहा था‌। यात्रा बिल्डिंग से शुरू होकर बिल्डिंग में ही आकर खत्म हुई थी। मानव अब बच्चों का इंटरव्यू ले रहा था। सब गणतंत्र दिवस के बारे में अंग्रेज़ी में अपनी जानकारी दे रहे थे। अपना इंटरव्यू खत्म करने के बाद मानव ने कहा, "ये नन्हें देशभक्त हमारे देश का उज्जवल भविष्य हैं। कल यही देश को आगे ले जाएंगे।" उसने सबसे एक बार ज़ोर से जय हिन्द बोलने को कहा। बच्चों ने भी पूरे उत्साह से जय हिन्द का नारा बुलंद किया। उन बच्चों के साथ पास खड़े दो और बच्चों की आवाज़ उस नारे में शामिल थी। उनके उत्साह में कोई कमी नहीं थी। उनके हाथों ने भी गर्व से तिरंगा थामा था। वह दोनों बाकी बच्चों से थोड़े अलग लग रहे थे।‌ उनके कपड़ों से पता चल रहा था कि वह गरीब घर के हैं। शायद उनकी माताएं बिल्डिंग के घरों में काम करती होंगी।  दोनों बहुत उत्साह से जय हिन्द ...

सामंजस्य

  सामंजस्य निर्मला ऑनलाइन हिंदी की क्लास में सामंजस्य शब्द का अर्थ समझा रही थी। "बच्चों सामंजस्य का मतलब होता है तालमेल बिठाना। मतलब अपने आसपास के वातावरण व लोगों के साथ इस प्रकार संबंध बनाना कि हम और हमारे आसपास सभी शांति से रह सकें।" एक बच्चे ने पूछा, "मैम पाठ में कहा गया है कि पर्यावरण से सामंजस्य बनाए रखना चाहिए। इसका क्या मतलब है ?" निर्मला ने समझाया, "बेटा इसका मतलब है कि हमारे आसपास पेड़ पौधे और अनेक प्रकार के जीव जंतु हैं। हम सभी प्राणियों में सबसे श्रेष्ठ हैं। इसलिए हमारा कर्तव्य है कि हम पर्यावरण की रक्षा करें जिससे बाकी के प्राणी भी धरती पर रह सकें।" अभी उसने अपना जवाब खत्म ही किया था कि उसके कानों में अपनी बेटी के चिल्लाने की आवाज़ सुनाई पड़ी। वह उठकर बेटी के पास भागी। उसने देखा कि उसके कमरे में एक बंदर घुस गया है। उससे डर कर उसकी बेटी कोने में दुबकी चिल्ला रही थी। निर्मला भाग कर बाथरूम से वाइपर ले आई। उसने बंदर को भगा दिया। दरवाज़ा बंद करके वह क्लास लेने के लिए वापस आ गई। बच्चों ने पूछा कि क्या हो गया था तो उसने कहा कि बंदरों ने उत्पात मचा रखा...

जीवन की सार्थकता

    जीवन की सार्थकता मुकेश बहुत उदास से कमरे में बैठे थे। उन्हें लग रहा था कि जैसे उनका जीवन ही व्यर्थ हो गया। उनके पास धन दौलत अधिक नहीं थी। प्रोफेसर के रूप में जो कमाते थे उसमें से एक हिस्सा समाजिक कल्याण के लिए रहता था। कॉलेज के होनहार छात्रों को मुफ्त में ट्यूशन देते थे। किसी को पैसों की ज़रूरत हो तो पीछे नहीं हटते थे। उनके छात्र उनकी बहुत इज्ज़त करते थे। उनके पढ़ाए हुए शिष्य कई ऊँचे ओहदों पर थे। लेकिन आज उनका बेटा धोखाधड़ी के इल्ज़ाम में पुलिस की हिरासत में था। उनसे छुपाकर ना जाने क्या क्या किया करता था। उन्होंने कई बार ‌पूछा कि वह क्या करता है तो बात को घुमाकर टाल देता था। उन्हें लग रहा था कि इतने बच्चों को सही रास्ता दिखाने वाले वह अपने बच्चे को भटकने से नहीं बचा पाए। यही बात उन्हें परेशान कर रही थी। वह सोच रहे थे कि शायद उसकी माँ जीवित होती तो ऐसा ना होता। उनके मित्र कैलाश कमरे में आए। बत्ती जलाकर उनके सामने बैठ गए। उन्होंने कहा, "अंधेरे में क्यों बैठे हो ?" "मेरे चिराग तले अंधेरा निकला उसका अफसोस कर रहा था।" कैलाश उनकी मनोदशा को समझकर बोले, "मैंने देखा...

गिरगिट

    गिरगिट नव्या की ज़िंदगी में कुछ सही नहीं चल रहा था। सरकारी नौकरी के लिए कई परीक्षाएं दीं। कुछ में असफल रही। कुछ के परिणाम अभी तक नहीं आए थे। इसी बीच उसकी शादी की बात चली। सांवले रंग की भरपाई के लिए गाड़ी की मांग हुई। वह उसके पिता की क्षमताओं के बाहर था। बात खत्म हो गई। इस समय वह बहुत परेशान थी। सोच रही थी कि कोई प्राइवेट नौकरी कर ले। वह अखबार में नौकरी के इश्तिहार देखने लगी। कुछ को मार्क किया। एक जगह फोन मिलाने जा रही थी कि उसकी सहेली का फोन आया। फोन उठाते ही उसने मुबारकबाद दी। नव्या हैरान थी कि मुबारकबाद किस बात की। सहेली ने बताया कि रुके हुए परिणामों में से एक परीक्षा का नतीजा आ गया है। वह उस परीक्षा में उत्तीर्ण हो गई है। नव्या बहुत खुश हुई। उसने खुद भी इंटरनेट पर परिणाम देखा। वह इंटरव्यू की तैयारी करने लगी। इस बार उसने कोई कसर नहीं छोड़ी। इंटरव्यू में भी पास हो गई। उसकी सरकारी नौकरी लग गई। नौकरी लगने के एक महीने बाद ही जिन लोगों ने रिश्ता तोड़ा था वह पुनः उसके घर आए। लड़के की माँ ने कहा, "मेरा बेटा बहुत नाराज़ हुआ। उसने कहा कि गुण देखे जाने चाहिए। रूप रंग नहीं। लड़की न...

अपडेट

  रागिनी ने बॉस के केबिन में प्रवेश किया तो उसने उसे बैठने को कहा। उसके बाद अपनी सीट से उठ कर वह रागिनी के पास आकर टेबल पर बैठ गया। ऊपर से नीचे तक उसे भेदती निगाहों से देख कर बोला। "तुम्हारी ड्रेस तो बहुत सुंदर है। बहुत अच्छी फिटिंग है।" रागिनी ने बिना कुछ कहे अपना मोबाइल उठा लिया। यह देख कर बॉस ने कहा। "यह क्या कर रही हो?" "सर आप अपनी बात जारी रखिए। मैं ट्विटर पर अपडेट कर रही हूँ।" बॉस तुरंत अपनी सीट पर वापस चला गया। "वो मेरा मतसब था कि मेरी पत्नी को भी कुछ टिप्स दे दो। वह कपड़ों को लेकर परेशान...." रागिनी ने बात काटते हुए कहा। "अगर कोई काम ना हो तो मैं जाऊँ।" बॉस के कुछ कहने से पहले रागिनी कमरे से बाहर चली गई।

बदलाव

  सारिका दस साल बाद अपनी बड़ी बहन के घर आई थी। विदेश में अपने बच्चों के पास रहने के कारण अपने बहनोई की मृत्यु पर भी नहीं आ सकी थी। सारिका महसूस कर रही थी कि उसकी बड़ी बहन मे बहुत से बदलाव आ गए थे। पहले वह हफ्ते में चार दिन उपवास रखती थी। बहुत सा समय पूजा पाठ में बिताती थी। लेकिन इधर सारिका ने देखा कि वह हफ्ते के उन दिनों में उपवास नहीं कर रही थी। रोज़ नहा कर भगवान की पूजा करती थी किंतु पहले की तरह वह बहुत लंबी नहीं होती थी। कल शाम तो वह सबके साथ बाहर खाना खाने भी गई थी। दोपहर को जब सारिका अपनी बहन के पास बैठी तो उसने पूँछा। "दीदी तुम तो बहुत बदल गई हो। ना कोई व्रत उपवास। पूजा भी कुछ ही समय के लिए करती हो। बेटे के साथ रहना पड़ रहा है तो क्या उनके हिसाब से...." "सारिका ऐसा नहीं है कि ईश्वर पर मेरा यकीन कम हुआ है। वह तो पहले से बहुत अधिक बढ़ गया है। हाँ पहले उपवास और पूजा पाठ में अधिक समय देती थी। मैंने महसूस किया कि इसके चलते बच्चे और तुम्हारे जीजाजी मुझसे कुछ दूर हो गए। बात थोड़ी देर में समझ आई। तुम्हारे जीजाजी तो रहे नहीं पर अब मैं कोशिश करती हूँ कि बचा हुआ समय बच्चों के...

मुखिया

  नीरज को ज़ोर से प्यास लगी थी। अभी उसने दो घूंट पानी ही पिया होगा कि पता चला कि टेंट वाले ने कुर्सियां व गद्दे भिजवाए हैं। जल्दी से पानी पीकर वह सब सामान सही जगह रखवाने के लिए भागा। सुबह से घड़ी भर को भी चैन से नहीं बैठ सका था। कभी किसी का हिसाब करना पड़ता तो कभी काम का मुआयना करना पड़ता। समारोह का सारा दायित्व इस बार उस पर था। पहले सब बड़े भइया संभालते थे। तब उसे लगता था कि उनका काम कितना आसान है। बस लोगों को आदेश दो और काम पर नज़र बनाए रखो। किंतु आज उसे समझ आ रहा था कि मुखिया होना सबसे कठिन काम है।

दाल में नमक

  दाल में नमक दसवीं कक्षा के छात्र विपिन ने ‌अपने दोस्त को बताया कि वह रविवार को कुछ लड़कों के साथ घूमने जाएगा। उसके दोस्त ने पूँछा कि क्या उसके घरवालों ने इजाज़त दे दी है। इस पर विपिन ने कहा, "इजाज़त मांगूंगा तो नहीं देंगे। कह दूँगा कि इम्तिहान आने वाले हैं। इसलिए एक्स्ट्रा क्लास है।" उसके दोस्त ने कहा, "अपने घरवालों से झूठ कहोगे।" विपिन ने बड़ी शान से कहा, "पापा एक दिन मम्मी से कह रहे थे कि जैसे दाल में नमक ना हो तो अच्छी नहीं लगती है। वैसे ही ‌ज़िंदगी में झूठ ना बोलें तो काम नहीं चलता।" यह कहकर वह अपनी साइकिल पर सवार होकर चला गया।

हुनर

     हुनर अभी सूरज उगने में समय था। मंजुला आज जल्दी जाग गई थी। बल्की सच तो यह था कि रात भर सोई ही नहीं थी। भविष्य की चिंता ने उसे सोने ही नहीं दिया था। जब उसने अपने बगल में सोए दो साल के अपने बेटे को सोते देखा तो उसकी नींद आँखों से गायब हो गई। कोरोना ने पहले उसके पति का रोज़गार चौपट कर दिया था। उसके बाद उसके शरीर में घुसकर प्राण निकाल लिए। इस समय ना पति था और ना ही पैसे। जो जमा पूंजी थी खर्च हो गई थी। समझ नहीं आ रहा था कि आगे क्या करेगी।  वह उठकर दूसरे कमरे में गई। कोने में रखी हुई सिलाई मशीन पर नज़र पड़ी। उसने घर के पास एक सरकारी सेंटर से सिलाई का कोर्स किया था। कपड़े डिज़ाइन करना सीखा था। तब उसके पति ने यह लेटेस्ट सिलाई मशीन खरीद कर दी थी। उसके बाद तो समय ने इतनी उथल पुथल मचाई कि सब छूट गया। उसने सिलाई मशीन पर पड़ा कवर हटाया। उसे छूकर देखा। अचानक उसके मन में ‌उम्मीद की किरण जागी।  कुछ हो ना हो उसका हुनर तो उसके साथ है। उसका बेटा जाग गया था। वह उसके पास गई‌। उसे गोद में उठाकर चूमने लगी।  खिड़की से बाहर देखा तो सूरज उग रहा था।

मन का डर

   मन का डर शाम ढल रही थी। अपने पति के नाम का दिया जला कर ललिता वहीं बैठ गई।‌ अपने पति को याद करने लगी। हमेशा सबकी मदद को तैयार रहते थे। मोहल्ले में किसी के घर में भी गमी हो जाती थी तो उसके दरवाज़े पर ज़रूर हाज़िर होते थे। दो साल पहले उनके मकान के पीछे वाली लाइन में रहने वाले धवन साहब की मौत हो गई। उनके घर से खास परिचय भी नहीं था। खबर सुनते ही जाने को तैयार हो गए थे। रात में तेज़ बुखार था। दवा खाकर सोए थे। ललिता ने कहा कि कभी आना जाना नहीं रहा। कल रात बुखार था। मत जाइए। सुनते ही बोले कि भले ही किसी की खुशी में ना जाओ। पर गमी में ज़रूर जाना चाहिए। यही तो वक्त होता है जब लोगों की सहानुभूति की ज़रूरत होती है। अपनी बात कहकर निकल गए थे। घाट तक साथ गए थे। ललिता की आँखें भर आईं। पति के जाने का दुख तो था ही। पर इस बात का भी अफसोस था कि जब उनकी अर्थी उठी तब बड़ी मुश्किल से चार कंधे मिले। कोई दरवाज़े पर भी नहीं आया। सब अपने अपने गेट से झांकते रहे। उसने अपने आंसू पोंछे। किसे दोष दे और क्यों दे। समय ही ऐसा है। एक वायरस ने सबके मन में डर बैठा दिया है।

पराए बच्चे

  दयाल बाबू आज फिर चोटिल होकर घर आए। घावों पर दवा लगाती हुई पत्नी बड़बड़ाने लगी। "क्यों जाते हैं उस बस्ती में नशे के खिलाफ प्रचार करने के लिए। अभी तो थोड़ा बहुत पीट कर छोड़ दिया। कल को जान से मार दिया तो ?" "जो भी हो इस डर से मैं चुप होकर नहीं बैठूंगा। वो लोग छोटे छोटे बच्चों को नशे का आदी बना रहे हैं।" "पराए बच्चों की फिक्र है। कभी अपने बच्चों के बारे में सोंचा है।" "अपने बच्चों के लिए तो अपना फर्ज़ निभा ही रहा हूँ। पर मेरे लिए वो बच्चे भी अपने हैं। मैं उन्हें भटकते नहीं देख सकता हूँ।" दयाल बाबू ने रूई ली और खुद ही जख्म साफ करने लगे।

वापसी

नमित ने जब अपना फैसला सुनाया तो उसके माता पिता परेशान हो गए। माँ ने रोते हुए कहा कि उन लोगों ने मेहनत करके उसे इसलिए पढ़ाया था कि वह गांव में जाकर अपना जीवन बर्बाद कर ले। नमित जानता था कि गांव की समस्या पलायन से दूर नहीं होगी। उल्टा शहरों पर अनावश्यक बोझ बढ़ेगा। इसलिए जलविज्ञान की पढ़ाई करने के बाद उसने तय किया था कि अपने गांव जाकर हर साल पड़ने वाले सूखे से निपटने की लड़ाई लड़ेगा।

संध्या आरती

अनिल जब ऑटो से उतरा तो बिल्डिंग देख कर लगा कि यहाँ तो सब साधारण फ्लैट ही होंगे। उसे आश्चर्य हुआ। महंगी जीवनशैली के आदी उसके चाचा यहाँ कैसे रहते होंगे। पर जब उससे बात हुई थी तब तो उन्होंने अपना नया पता यही बताया था।   अनिल कोई दस साल बाद इस शहर में अपने गुरूजी के समागम में हिस्सा लेने आया था। वह उन्हें बहुत मानता था। छोटी उम्र में उन्होंने सन्यास ले लिया था। सारे देश में बहुत से आश्रम थे उनके। वह चाह रहा था जल्द से जल्द अपने गुरूजी की तस्वीर रख कर संध्या आरती कर सके। जब वह सीढ़ियां चढ़ कर तीसरे फ्लोर पर पहुँचा तो उसे और अधिक आश्चर्य हुआ। यह एक कमरे का साधारण फ्लैट था। सिर्फ एक पंखा लगा था। चाचाजी फर्श पर चटाई डाले बैठे थे। "चाचाजी आपने वकालत छोड़ दी। अब आप इतने साधारण ढंग से क्यों रहते हैं ?" "वकालत मैं अभी भी करता हूँ। फीस भी पहले की तरह ही वसूलता हूँ। अपनी ज़रूरतें पूरी करने के बाद जो बचता है वह समाज की आवश्यक्ता पर खर्च कर देता हूँ।" अपने चाचा की बात सुन कर संध्या आरती करने की अनिल की इच्छा खत्म हो गई।

संघर्ष

आई.आई.टी की पढ़ाई पूरी करते ही वैभव को एक बड़ी आईटी कंपनी ने अच्छा पैकेज ऑफर किया। सारे कैंपस में वैभव की इस सफलता की चर्चा ज़ोरों पर थी। ज्वाइनिंग से पहले वैभव अपने माता पिता से मिलने जाने की तैयारी कर रहा था। आज वह उन लोगों के प्रति कृतज्ञता महसूस कर रहा था। बचपन में जब उसके जन्मदिन पर सस्ते खिलौने मिलते थे तब वह बहुत दुखी होता था। अपने दोस्तों को खिलौने दिखाने में शर्माता था। पर आज उसे एहसास हो रहा था कि उसके माता पिता ने कितनी कठिनाइयां सह कर उसे इस मुकाम तक पहुँचाया है। महंगे खिलौनों पर इतराने वाले उसके दोस्त कितने पीछे रह गए थे।

मौन आक्रोश

पोलिंग बूथ में लाइन में लगा मुन्ना अपनी बारी आने की प्रतीक्षा कर रहा था। मन में एक उथल पुथल मची थी। बढ़ती महंगाई ने उसकी कमर तोड़ कर रख दी थी। पढ़ा लिखा बेटा बेरोज़गार था। जवान बेटी जब कॉलेज के लिए निकलती थी तो मन में डर रहता था कि सुरक्षित आएगी या नहीं। इन सबके बीच आज वह वोट डालने आया था। अपनी बारी आने पर भीतर गया। दस्तखत कर उंगली पर निशान लगवाया। फिर वोटिंग मशीन की तरफ चला गया। कौन सा बटन दबाना है वह पहले ही तय कर चुका था। इतने सालों के अनुभव ने बता दिया था कि सत्ता मिलने पर सभी उसके मद में डूब जाते हैं। उसने नोटा दबा दिया।

दस्तक

मनीषा बहुत देर से अपने कमरे में बैठी योजना बना रही थी कि भतीजी के  मुंडन की पार्टी में क्या क्या होना चाहिए। अभी तक उसे लगता था कि भाई और उसकी पत्नी को दुनियादारी का अनुभव नहीं है। अतः अभी भी हर काम का दायित्व उस पर ही है। हलांकि उसकी सहेली अचला ने कई बार समझाया था कि यह तुम्हारी भूल है। उन्हें उनकी ज़िंदगी जीने दो। तुमने भाई को उसके पैरों पर खड़ा कर अपना दायित्व पूरा कर लिया। अब उसे खुद सब करने दो। तुम अब अपने जीवन पर ध्यान दो। लेकिन मनीषा मानती ही नहीं थी। वह अपनी योजना बताने भाई के कमरे की तरफ बढ़ी। दस्तक देने ही जा रही थी कि भाभी की आवाज़ सुनाई पड़ी। "परी के मुंडन में जो होना है वह मेरी पसंद का होगा। तुम दीदी को समझा देना। बेवजह दखल ना दें।" मनीषा ने अपना हाथ रोक लिया। कुछ पल चुप रहने के बाद मुस्कुराई। एक जबरन ओढ़े गए बोझ से उसे छुट्टी मिल गई थी।

सच्ची पूजा

ह्रदय बाबू करीब साल भर बाद इस मंदिर में आए थे। जब भी उनके जीवन में किसी चीज़ की आवश्यक्ता होती थी तो वह इसी मंदिर में आकर देवी से उसके लिए प्रार्थना करते थे। ह्रदय बाबू पूजा का सामान लेने दुकान पर गए तो दुकानदार को देख चौंक गए। वह सरजू था। पहले छोटी सी टोकरी में रख कर मंदिर के बाहर फूल बेचता था। "ये तुम्हारी दुकान है सरजू ?" "हाँ बाबूजी इस नवरात्री के पहले दिन ही उद्घाटन किया है।" "वाह इतनी जल्दी तरक्की कर ली। कोई पूजा वगैरह करवाई थी क्या ?" "बाबूजी हम बहुत पढ़े लिखे तो हैं नहीं पर मंदिर की दीवार पर लिखा है कर्म ही पूजा है। हमने वही पूजा की है।" ह्रदय बाबू सोंच रहे थे कि मंदिर से सबसे बड़ा ज्ञान तो सरजू ने लिया है।

प्रतीक्षा

रीमा सामने बैठे सचिन को ताक रही थी। अचानक सचिन की निगाह पड़ी तो आँखों ही आँखों में उसने पूँछा 'ऐसे क्यों ताक रही हो?' रीमा ने अपनी आँखें झुका लीं। तभी अंदर जाने का बुलावा आया। भीतर पहुँच कर दोनों ने रजिस्ट्रार के सामने दस्तखत किए। गवाहों ने भी दस्तखत किए। दोनों ने एक दूसरे को फूलों की माला पहनाई। आज सचिन का पंद्रह साल का इंतज़ार खत्म हो रहा था। यह पंद्रह साल उसने बिना किसी शिकायत के अकेलेपन में बिताए थे। ताकि रीमा अपने पारिवारिक दायित्वों से मुक्त हो सके।

भीड़ से अलग

पापा का फोन आया देख मयंक समझ गया कि आज भी वही बातें सुनने को मिलेंगी। उसे मुंबई में संघर्ष करते पाँच साल हो गए थे। नौकरी के अच्छे अवसर को छोड़ कर वह यहाँ अपना सपना पूरा करने आया था। इस बीच उसके दोस्त और चचेरे भाई बहन अपने जीवन में व्यवस्थित हो गए थे। अतः उसके पापा को लगता था कि फिल्म लाइन में काम पाने के लिए वह जो संघर्ष कर रहा है वह महज़ समय की बर्बादी है। उसके हाथ कुछ नहीं आएगा। एक दिन वह किसी और नौकरी के लायक नहीं रह जाएगा। उसने फोन उठाया तो पापा ने बताया कि उसके एक और दोस्त की शादी हो रही है। बड़े दुखी मन से वह बोले। "हमारे नसीब में पता नहीं यह सुख है भी कि नहीं कि तुम्हें सेटेल होते देखें। तुम बताओ कि आखिर हमसे ऐसा कौन सा पाप हो गया जिससे तुम पर यह फितूर चढ़  गया।" मयंक कुछ नहीं बोल सका। उन्हें कैसे समझाता कि यह उसका फितूर नहीं बल्कि दुनिया की भीड़ से हट कर अपनी अलग पहचान बनाने की उसकी छटपटाहट है।

अपनी लड़ाई

रजनी ने लगभग सारी तैयारी कर ली थी। वह आखिरी बार उसका निरीक्षण कर रही थी। तभी उसकी माँ कमरे में आईं। "बिटिया नौकरी के लिए इतनी दूर जाना आवश्यक है क्या ? जब तक  मैं और तुम्हारे पापा ज़िंदा हैं तुम्हें फिक्र करने की क्या ज़रूरत है।" रजनी ने उन्हें बैठा कर प्यार से समझाया। "आप दोनों तो मेरी ताकत हैं। पर मम्मी हर एक को अपनी ज़िंदगी की लड़ाई खुद लड़नी चाहिए। आप लोगों ने मुझे इस लायक बनाया है।" उसने मेज़ पर रखी अपने स्वर्गीय पति की तस्वीर उठा कर बैग में रख ली। अब वह अपनी मंज़िल पर जाने को तैयार थी।