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संदेश

उड़नखटोला

वो अपनी साईकिल में बैठी तेज़ी से चली जा रही है। उसने सबको पीछे छोड़ दिया है। ऐसा लगता है मानो हवा के रथ पर सवार हो। जब भी कोई सामने आता दिखाई देता तो ' ट्रिन ट्रिन ' साईकिल की घंटी बजा देती। वो बहुत खुश है। " चंदा उठ आज इस्कूल नहीं जाना है क्या ? " उसकी माँ ने उसे झिंझोड़ कर जगाया। चंदा ने आँखें खोलीं। चारों तरफ देखा। वो अपनी खटिया पर थी। वो सपना देख रही थी। " क्यों आज इस्कूल की छुट्टी है क्या ? " उसकी माँ ने सवाल किया। चंदा ने ना में सर हिलाया और उठ कर तैयार होने चली गई। चंदा रोज़ एक लंबी दूरी तय करके स्कूल जाती है। कोई साधन न होने के कारण उसे पैदल ही जाना पड़ता है। आने जाने में बहुत वक़्त लगता है और वह थक भी जाती है। उसके पिता एक छोटे किसान थे। उनकी इच्छा थी कि वह खूब पढ़े। उनके जाने के बाद चंदा की माँ अब अपने पति की इस इच्छा पूरा करना चाहती है। अतः तकलीफें उठा कर भी उसे पढ़ा रही है। आठवीं तक की पढ़ाई उसने गाँव के स्कूल से की। किंतु आगे की पढ़ाई के लिए उसे दूसरे गाँव जाना पड़ता है। उसकी ही नहीं गाँव के हर बच्चे की जो आगे पढ़ना चाहता है यही समस्या है। चंदा प...

अंतिम इच्छा

अस्पताल के कॉरिडोर में  कुर्सी पर बैठी मिसेज बाजपेई छत को ताक रही थीं। अपने बेटे के शब्द उनके कान में गूँज रहे थे " माँ मैं ऐसा कुछ करना चाहता हूँ जिससे समाज का भला हो। जिसके द्वारा मरने के बाद भी मैं किसी न किसी रूप में ज़िंदा रहूँ। " किंतु जिस बेटे को मुसीबतें झेल कर पाला था वह २५ वर्ष की उम्र में ही सड़क हादसे का शिकार हो गया।  कुछ क्षणों पहले ही डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। अपने बेटे की इच्छा पूरी करने के लिए वो उठीं और डाक्टर को अपना फैसला बताया। उनका बेटा अब दूसरों को जीवन देगा। अपनी मृत्यु के बाद भी जीवित रहेगा।  

परवाज़

मिसेज़ सेठ ने उसे उसका कमरा दिखाया। गायत्री ने कमरे को ध्यान से देखा। कमरे में एक बेड, एक अलमारी और एक राइटिंग डेस्क थी। कमरे की खिड़की घर के गार्डन में खुलती थी। ताज़ी हवा के साथ साथ अच्छा नज़ारा भी मिल रहा था। मिसेज़ सेठ जाते हुए बोल गईं कि नौ बजे तक ब्रेकफ़ास्ट के लिए नीचे आ जाना। गायत्री खिड़की पर आकर खड़ी हो गई। आज से उसकी ज़िंदगी की नई शुरुआत हो रही थी। अब वह अपने दम पर अपनी शर्तों के हिसाब से जियेगी। जब पहली बार उसने माँ को अपना निर्णय सुनाया तो उन्होंने इसका विरोध किया। " ये कैसी बात कर रही हो तुम । कहीं पति पत्नी का रिश्ता भी टूटता है। पागल मत बन। धैर्य रख समय के साथ सब ठीक हो जायेगा। " माँ ने उसे समझाया उसने एक प्रश्न भरी नज़र  माँ पर डाली " तुमने भी तो पैंतीस वर्ष धैर्य रखा न, क्या मिला। समय के साथ कुछ नहीं बदला बस तुमने सब कुछ चुपचाप सहने की आदत डाल ली है। " माँ कुछ बोल नहीं पाईं। उन्होंने बस सजल नेत्रों से गायत्री को देखा। गायत्री उनका दिल नहीं दुखना चाहती थी। उसे अपनी गलती का आभास हुआ।  वह बोली " सॉरी माँ मैंने तुम्हारा दिल ...

वरदान

सुमित्रा देवी बड़े उत्साह से कन्याओं को भोजन करा रही थीं। स्वयं ही यह देख रही थीं कि किसी को कुछ चाहिए तो नहीं। जब सभी कन्यायें भोजन कर चुकीं तो वे सभी के पाँव छू कर उन्हें दक्षिणा देने लगीं।  अब सिर्फ एक ही कन्या बची थी जो उम्र में सबसे कम थी। सुमित्रा देवी ने उसके पाँव छू कर कहा " माता मेरी बहू उम्मीद से है। इस बार मेरी झोली में एक पोता डाल दो। " नन्ही बच्ची खिलखिला कर हंस पड़ी। शायद समाज के दोगले आचरण पर हंस रही थी।

प्रगति

मिस्टर शर्मा के ड्राइंगरूम में मेहफिल जमा थी। चाय की चुस्कियों के बीच भारत के एक विश्व शक्ति के रूप में उभरने की चर्चा चल रही थी।  दुबे जी ने एक बिस्किट चाय में डुबाते हुए कहा " अजी अब हम किसी चीज़ में पीछे नहीं रहे। बात चाहें अंतरिक्ष विज्ञान की हो या फिर व्यापार की किसी भी बात में हम अब टक्कर ले सकते हैं। वो दिन दूर नहीं जब हम विश्व की महान शक्तियों में गिने जायेंगे। " इस परिचर्चा के बीच में अचानक ही घंटी बजी और एक स्वर सुनाई दिया " आंटी जी कूड़ा " मिसेज शर्मा को बीच में यूँ उठना पसंद नहीं आया। झुंझलाकर बोलीं " इस कूड़ा लेने वाले का भी कोई वक़्त नहीं। असमय चला आता है। " बाहर आकर उन्होंने गेट खोला। दस साल का एक लड़का भीतर आया और कूड़े की बाल्टी से कूड़ा  निकाल कर एक प्लास्टिक के थैले में भरने लगा। " आस पास जो बिखरा है वह भी बटोर लो। " मिसेज शर्मा ने कहा। फिर एक प्लास्टिक का थैला ज़मीन पर रख कर बोलीं " इसमें कुछ कपड़े हैं ले लो। " बच्चे ने थैला ऐसे उठाया मानो कोई खज़ाना हो। बाहर चिलचिलाती धुप में देश का बचपन फटे पुराने में ख़ुशी तलाश रहा था। ...

अधूरी बाज़ी

मेरे सामने मेज़ पर शतरंज पड़ा था जो एक बाज़ी के अधूरे रह जाने की गवाही दे रहा था। मैं अभी भी जतिन दा की उपस्तिथि को महसूस कर सकता हूँ। वो पूरे उत्साह के साथ  मुझे हरा देने का दावा कर रहे हैं। शतरंज पर पड़े मोहरे उनके स्पर्श को आकुल प्रतीत हो रहे हैं जैसे वे भी उनकी तरह मुझे हराना चाहते हों। जतिन दा मेरे मौसेरे भाई थे। उम्र में मुझ से कुछ ही महीने बड़े थे किंतु उनका मेरे प्रति प्यार एक बड़े भाई की भांति था। इसीलिए मैं उन्हें जतिन 'दा' कह कर बुलाता था। वैसे हमारी मित्रता कालेज के दिनों से आरम्भ हुई थी।  हम साथ साथ घूमते, फिल्में देखते खूब मस्ती करते थे।  उन दिनों हमारे भीतर बहुत जोश था। हम अक्सर राजनीति, धर्म, सामाजिक कुरीतियों पर गर्मागर्म बहस करते। हममें उन दिनों बहुत कुछ बदलने का जूनून था। उन्हीं दिनों मुझे एक नया शौक लगा था। फोटोग्राफी का। मैं अपना कैमरा लेकर निकल जाता और जो कुछ पसंद आता उसकी तस्वीर खींच लेता। जतिन दा इन तस्वीरों को देख कर कहते कि तुम्हें फोटोग्राफी की अच्छी समझ है। इसे छोड़ना नहीं। हँसते खेलते ना जाने कब कालेज के दिन ख़त्म हो गए। कालेज ...

छोटी बेगम

नवाब साहब की हवेली में बहुत चहल पहल थी।  आज नवाब साहब अपनी नई बेगम को विदा करा कर ला रहे थे। हवेली भी दुल्हन की तरह सजी थी। सभी अपने अपने काम में लगे थे। दिलरुबा भी अपने काम में लगा था। किंतु आज उसका मन कुछ उदास था। अब तक वह बड़ी बेगम की ख़िदमत में था। अब उसे छोटी बेगम के हुज़ूर में रहने का हुक्म मिला है। बड़ी बेगम के निक़ाह के वक्त वह उनके साथ इस हवेली में आया था। तब से उनकी ही सेवा कर रहा था। हालाँकि उसके जैसे ख्वाजसरा का काम तो खिदमत करना  था। चाहें बेगम कोई भी हो। उसकी उदासी का कारण कुछ और ही था। आज उसे अपने पिछले जीवन की याद आ रही थी। उन अपनों की जो वक़्त के बहाव में कहीं खो गए थे। अजय का गौना हुए तीन माह बीत चुके थे। उसकी पत्नी लक्ष्मी बेहद खूबसूरत थी। उसे अपने रंग रूप पर बहुत गुमान था। अजय से अपने नख़रे उठवाना उसे बहुत अच्छा लगता था। दरअसल अजय के नाक नक़्श स्त्रियों की भांति थे। उसके हाव भाव में एक स्त्री सुलभ कोमलता थी। अतः अपने मित्रों के बीच अक्सर वह उपहास का पात्र बनता था। किंतु अपनी स्त्री के सम्मुख वह किसी भी प्रकार कम नहीं पड़ना चाहता था। इसीलिए उसके...