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चैन की नींद

सोते हुए सुरेश के चेहरे पर अचानक दूसरे का पैर महसूस किया तो गुस्से से उबल पड़ा। पैर को झटकते हुए चिल्लाया "हाथ पैर समेट कर रखो।" वह दूसरा व्यक्ति हड़बड़ा कर उठ बैठा। और लोग भी जाग गए। किसी ने बिजली जला दी। उनमें से   एक बोला "भाई क्यों गुस्सा हो रहे हो? इस छोटे से कमरे में हम पाँच लोग जैसे तैसे सोते हैं। हाथ पैर तो टकरा ही जाते हैं।" सभी को अपनी तरफ घूरते देख सुरेश उठा और अपने कपड़े पहन कर बाहर निकल गया। बेमकसद टहलते हुए वह मुख्य सड़क पर आ गया। दोनों तरफ जगमगाती हुई ऊँची इमारतें थीं। उनकी तरफ हसरत भरी निगाह से देखने लगा। इनमें बड़े बड़े फ्लैट होंगे। लोग आराम से फैल कर रहते होंगे। यहाँ तो इतनी भी जगह नहीं कि पैर पसार कर सोया जा सके। उसे गाँव की याद आ गई। घर के बाहर नीम के नीचे चारपाई डाल कर सोता था। अब तो तंग कमरे में किसी तरह हाथ पाँव सिकोड़ कर रहता है। तभी इतना चिड़चिड़ा हो गया है। उसका गुस्सा शांत हो गया था। लेकिन वापस जाकर वह सबको परेशान नहीं कर सकता था। अतः वह फुटपाथ पर सोए लोगों के बीच वेट गया।

आसरा

"बाबूजी अगरबत्ती ले लो। बहुत अच्छी खुसबू है।"  दिनेश अपने फोन पर मैसेज लिख रहा था। टालने के लिए बोला "नहीं चाहिए।" "ले लो भगवान के सामने जलाना।" दिनेश झुंझला कर डांटने वाला था तभी उसकी निगाह हाथ में अगरबत्ती का पैकेट पकड़े बुज़र्ग पर पड़ी। उस बुज़र्ग की आँखों में विनती का भाव देख कर उसका मन पिघल गया। उसने चार पैकेट ले लिए। पैसे देते हुए वह बोला "आप इस उम्र में भी अगरबत्ती बेचते हैं।" "पेट उमर नहीं देखता बाबूजी। उसे तो रोटी चाहिए।" जवाब सुनकर दिनेश अपने ही सवाल पर लज्जित हो गया। वह बुज़र्ग व्यक्ति बोला "जब जो काम मिल जाता है कर लेते हैं। अब इस उमर में कोई नौकरी तो देता नहीं है।" "रोज काम मिल जाता है।" दिनेश ने आगे पूँछा। "हाँ रामजी कोई ना कोई सहारा भेज ही देते हैं। नहीं तो उनका नाम लेकर फाका कर लेते हैं।" कहता हुआ वह बुज़र्ग आगे बढ़ गया।

बिरवा

शांता ने रोज़ की तरह पौधे को पानी दिया। आसपास थोड़ी गोड़ाई की। पौधे पर लगे सुंदर फूलों को देखकर उसका मन भी खिल गया। "मैडम आप इस पौधे की देखभाल खुद करती हैं। मुझे हाथ भी नहीं लगाने देतीं हैं। ऐसा क्यों?"  माली के इस सवाल पर शांता खामोश रही।  यह पौधा उसके पति विलास का लगाया हुआ था। वह भारतीय डॉक्टरों के एक दल के साथ युद्ध ग्रस्त राष्ट्र में सेवा के लिए जा रहा  था। उसके जाने की खबर सुन कर शांता परेशान हो गई थी।  "तुम इतने दिनों के लिए जा रहे हो। मैं क्या करूँगी तुम्हारे बिना?"  विलास उसे इस पौधे के पास ले आया था। "मैंने यह पौधा लगाया है। तुम इसकी देखरेख करना। मैं लौट कर आऊँ तो इस पर फूल खिले होने चाहिए।" चार साल हो गए एक आतंकवादी संगठन ने विलास का अपहरण कर लिया था। आज तक उसकी कोई खबर नहीं मिल पाई थी। तब से शांता पूरी लगन से इस पौधे की देखभाल कर रही थी। इस उम्मीद से कि एक दिन विलास इस पर खिले हुए फूलों को देखकर मुस्कुराएगा।

बराबर की जोड़ी

"आपकी बेटी और हमारे बेटे की जोड़ी खूब जमेगी। दोनों हर चीज़ में बराबर हैं। हमें तो रिश्ता मंजूर है।" बांकेलाल ने अपने होने वाले समधी किशोर से कहा। किशोर ने उन्हें लड्डू खिलाते हुए बधाई दी। बांकेलाल मिठाई का स्वाद ले रहे थे तभी उनकी पत्नी ने कोहनी मार कर बात आगे बढ़ाने का इशारा किया। बांकेलाल ने बात आगे बढ़ाते हुए कहा "तो किशोर बाबू आपका क्या संकल्प है।" "जी संकल्प तो था बेटी को पढ़ा लिखा कर पैरों पर खड़ा करना। वह पूरा हो गया।" "आप तो मज़ाक करने लगे। मेरा मतलब था कि बेटी को विवाह में कितना देने का विचार किया है।" बांकेलाल दांत निकालते हुए बोले। किशोर ने कुछ सोंच कर सवाल किया "एक बात बताइए जब दोनों की बराबर की जोड़ी है तो दहेज़ क्यों?" यह सवाल सुन कर बांकेलाल बगलें झांकने लगे।

अपना आपा

रागिनी और ज्योती दोनों बहुत समय के बाद मिली थीं। दोनों कॉलेज के समय की पक्की सहेलियां थीं। कॉफी पीते हुए एक दूसरे से बात कर रही थीं। रागिनी महसूस कर रही थी कि ज्योती का ना सिर्फ बाहरी रूप बदला है बल्कि उसका स्वभाव भी बदल गया है। पहले सबसे खुले दिल मिलने वाली ज्योती आज अपनी सखी के साथ भी दूरी बनाए हुए थी।  अपनी दोनों हाथेलियों के बीच कॉफी का मग पकड़े हुए रागिनी बोली "तुम तो बिल्कुल ही बदल गईं। पहले जैसी कोई बात ही नहीं रही।" ज्योती ने कॉफी का मग टेबल पर रखते हुए कहा "पर तुम तो ज़रा भी नहीं बदलीं जैसी पहले थीं वैसे ही आज भी हो। बिना संकोच मन की बात कर देती हो।" कुछ ठहर कर उसने आगे जोड़ा "वैसे हर किसी को समय के साथ बदलना चाहिए।" रागिनी ने उसकी आँखों में आँख डाल कर कहा "सही कहा तुमने लेकिन बदलाव इतना भी नहीं होना चाहिए कि इंसान अपने आप को ही भूल जाए।" ज्योती को लगा जैसे रागिनी की निगाह उसके भीतर तक झांक रही थी।

भूल

राधा ने अपने बेटे से कहा "इनके पैर छुओ। अगर यह ना होते तो तुम अपनी पढ़ाई पूरी ना कर पाते।" लड़का पैर छूने को आगे बढ़ा तो चंदर ने उसका हाथ पकड़ लिया। "जीते रहो। सब तुम्हारी मेहनत का फल है।" राधा बोल पड़ी "नहीं साहब आपकी दया है। वह दुष्ट तो मेरे पती को कुचल कर चला गया था। आपने इसकी पढ़ाई का जिम्मा ना उठाया होता तो ना जाने क्या होता।" राधा की बात सुनकर चंदर की आँखों के सामने दस साल पहले की तस्वीर घूम गई। सुनसान सड़क पर नशे की हालत में उसने किसी को कार से कुचल दिया था। बाद में पता चला कि मृतक उसका ही कर्मचारी था। गुनाह कबूलने का साहस नहीं था। उसके एहसास के साथ जीना भी कठिन था। अतः उसने मृतक के परिवार का जिम्मा उठा लिया।

कीमत

राकेश अपने माता पिता को मनाने के लिए कमरे में गया। उसे देखते ही माँ ने मुंह फेर लिया। पिता ने नाराज़ होकर कहा "अपने मन की ही करनी थी तो हमें क्यों उलझाए रखा इतने दिन। हम दोनों तुम्हारे लिए लड़की ढूंढ़ ही रहे थे।" राकेश कुछ देर शांत रह कर बोला "पापा मैंने तो सब कुछ आप लोगों पर ही छोड़ दिया था। पर माफ कीजिएगा आप लोग मेरे लिए लड़की नहीं ढूंढ़ रहे थे। बल्कि मेरी दुकान लगा कर बैठे थे। हर आने वाले रिश्ते को पैसे के तराजू में तौलते थे। पिछले दो साल से रोज़ अपने ऊपर एक नया कीमत का बिल्ला लगाने में मुझे शर्म आती थी। मुझे तो बस एक ऐसी पत्नी चाहिए थी जो सुख दुख में हमारा साथ निभा सके।" राकेश आगे बढ़ कर अपने माता पिता का हाथ पकड़ लिया।  "आप लोग यकीन रखें संध्या बहुत अच्छी बहू और पत्नी साबित होगी। हम दोनों मिल कर अपनी गृहस्ती की हर ज़रूरत पूरी कर लेंगे।"