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चैन की नींद

सोते हुए सुरेश के चेहरे पर अचानक दूसरे का पैर महसूस किया तो गुस्से से उबल पड़ा। पैर को झटकते हुए चिल्लाया "हाथ पैर समेट कर रखो।"
वह दूसरा व्यक्ति हड़बड़ा कर उठ बैठा। और लोग भी जाग गए। किसी ने बिजली जला दी। उनमें से   एक बोला "भाई क्यों गुस्सा हो रहे हो? इस छोटे से कमरे में हम पाँच लोग जैसे तैसे सोते हैं। हाथ पैर तो टकरा ही जाते हैं।"
सभी को अपनी तरफ घूरते देख सुरेश उठा और अपने कपड़े पहन कर बाहर निकल गया। बेमकसद टहलते हुए वह मुख्य सड़क पर आ गया। दोनों तरफ जगमगाती हुई ऊँची इमारतें थीं। उनकी तरफ हसरत भरी निगाह से देखने लगा। इनमें बड़े बड़े फ्लैट होंगे। लोग आराम से फैल कर रहते होंगे। यहाँ तो इतनी भी जगह नहीं कि पैर पसार कर सोया जा सके।
उसे गाँव की याद आ गई। घर के बाहर नीम के नीचे चारपाई डाल कर सोता था। अब तो तंग कमरे में किसी तरह हाथ पाँव सिकोड़ कर रहता है। तभी इतना चिड़चिड़ा हो गया है।
उसका गुस्सा शांत हो गया था। लेकिन वापस जाकर वह सबको परेशान नहीं कर सकता था। अतः वह फुटपाथ पर सोए लोगों के बीच वेट गया।

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