सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

अपना आपा

रागिनी और ज्योती दोनों बहुत समय के बाद मिली थीं। दोनों कॉलेज के समय की पक्की सहेलियां थीं। कॉफी पीते हुए एक दूसरे से बात कर रही थीं। रागिनी महसूस कर रही थी कि ज्योती का ना सिर्फ बाहरी रूप बदला है बल्कि उसका स्वभाव भी बदल गया है। पहले सबसे खुले दिल मिलने वाली ज्योती आज अपनी सखी के साथ भी दूरी बनाए हुए थी। 
अपनी दोनों हाथेलियों के बीच कॉफी का मग पकड़े हुए रागिनी बोली "तुम तो बिल्कुल ही बदल गईं। पहले जैसी कोई बात ही नहीं रही।"
ज्योती ने कॉफी का मग टेबल पर रखते हुए कहा "पर तुम तो ज़रा भी नहीं बदलीं जैसी पहले थीं वैसे ही आज भी हो। बिना संकोच मन की बात कर देती हो।" कुछ ठहर कर उसने आगे जोड़ा "वैसे हर किसी को समय के साथ बदलना चाहिए।"
रागिनी ने उसकी आँखों में आँख डाल कर कहा "सही कहा तुमने लेकिन बदलाव इतना भी नहीं होना चाहिए कि इंसान अपने आप को ही भूल जाए।"
ज्योती को लगा जैसे रागिनी की निगाह उसके भीतर तक झांक रही थी।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

केंद्र बिंदु

पारस देख रहा था कि आरव का मन खाने से अधिक अपने फोन पर था। वह बार बार मैसेज चेक कर रहा था। सिर्फ दो रोटी खाकर वह प्लेट किचन में रखने के लिए उठा तो पारस ने टोंक दिया। "खाना तो ढंग से खाओ। जल्दी किस बात की है तुम्हें।" "बस पापा मेरा पेट भर गया।" कहते हुए वह प्लेट किचन में रख अपने कमरे में चला गया। पारस का मन भी खाने से उचट गया। उसने प्लेट की रोटी खत्म की और प्लेट किचन में रख आया। बचा हुआ खाना फ्रिज में रख कर वह भी अपने कमरे में चला गया। लैपटॉप खोल कर वह ऑफिस का काम करने लगा। पर काम में उसका मन नही लग रहा था। वह आरव के विषय में सोच रहा था। उसने महसूस किया था कि पिछले कुछ महीनों में आरव के बर्ताव में बहुत परिवर्तन आ गया है। पहले डिनर का समय खाने के साथ साथ आपसी बातचीत का भी होता था। आरव उसे स्कूल में क्या हुआ इसका पूरा ब्यौरा देता था। किंतु जबसे उसने कॉलेज जाना शुरू किया है तब से बहुत कम बात करता है। इधर कुछ दिनों से तो उसका ध्यान ही जैसे घर में नही रहता था। पारस सोचने लगा। उम्र का तकाज़ा है। उन्नीस साल का हो गया है अब वह। नए दोस्त नया माहौल इस सब में उसने अपनी अलग दुनि...

बुआ दादी

पांच साल का बिट्टू समझ नही पाता था कि क्यों बुआ दादी सिर्फ सफेद साड़ी पहनती हैं. वह मम्मी और दादी की तरह लाल बिंदी लगाने की जगह चंदन का टीका क्यों लगाती है. आखिरकार उसने बुआ दादी से ही पूंछा. उस बाल विधवा की दबी हुई पीड़ा को इस बच्चे ने उभार दिया. क्या बताती कि होश संभालने से पहले ही पति को खो देने के दंड में समाज ने उसे इन बेड़ियों में जकड़ रखा है.

जन्मदिन का तोहफा

नकुल ने अपना गुल्लक खोला और अपनी जमा पूंजी को गिना. अभी भी बहुत पैसे इकठ्ठे करने हैं. पिछले तीन महिनों से वह पैसे बचा रहा था. आइसक्रीम चॉकलेट्स की अपनी इच्छा को दबाकर सारी पॉकेटमनी जमा कर देता था. इस बीच पड़े अपने जन्मदिन पर कपड़ों के लिए मिले पैसे भी उसने खर्च नही किए. घर में सभी जानते थे कि वह पैसे बचा रहा है पर क्यों यह एक रहस्य था. वह किसी को कुछ नही बताता था. घर वाले यह सोंच कर खुश थे कि इसी बहाने बचत की आदत पड़ रही है. नकुल पढ़ने लिखने में बहुत होशियार था. सदैव अच्छे अंक लाता था. उसे यदि कोई टक्कर दे पाता था तो वह था उसका बेस्ट फ्रेंड संजीव. संजीव भी एक मेधावी छात्र था. नकुल और उसके बीच एक स्वस्थ प्रतियोगिता चलती थी कि देखें इस बार कौन कक्षा में प्रथम आता है. दोनों में आपस में बहुत प्रेम था. हलांकि दोनों के परिवारों की आर्थिक स्थिति में बहुत फ़र्क था. नकुल के माता पिता दोनों बहुत अच्छा कमाते थे. उसके घर में किसी चीज़ की कमी नही थी. जबकी संजीव के पिता एक छोटी सी दुकान चलाते थे. घर में प्रायः पैसों का आभाव रहता था. संजीव पढ़ने में अच्छा था इसीलिए उसकी फीस माफ थी तथा उसे छात्...