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संदेश

खिंचाव

                             शाज़िया और अब्रार घबराए हुए से पुलिस स्टेशन में दाखिल हुए। "हमें अपने बच्चे की गुमषुदगी की रिपोर्ट लिखानी है।" शाज़िया ने भर्राए हुए स्वर में कहा। "जी ज़रूर लिखेंगे। पहले आप बैठ जाएं।" ड्यूटी पर मौजूद पुलिस इंस्पेक्टर ने कहा। शाज़िया और अब्रार के बैठने पर इंस्पेक्टर ने कहा। "अब बताइए। बच्चा कब से गायब है। आप लोगों ने आस पड़ोस, रिश्तेदारों से पूँछताछ की।" "जी सब जगह पता कर लिया। हमारे बेटे का कोई पता नहीं चल रहा।" अब्रार ने जवाब दिया। "ठीक है बच्चे के बारे में बताइए।" "नाम है अमान, उम्र बारह वर्ष, छठी कक्षा में पढ़ता है।" अब्रार ने बच्चे के बारे में बताया।" "कद काठी।" "मंझोला कद है। रंग गेहुंआ। इकहरा बदन है।" "कब से गायब है।" "आज शाम छह बजे से। सर वो यह नोट छोड़ कर गया है।" अब्रार ने जेब से एक कागज़ निकाल कर बढ़ा दिया। इंस्पेक्टर उसे पढ़ने लगा। 'मम्मी मैं जा रहा हूँ। ...

अंतर्जाल

                            इंस्पेक्टर शारिक पूँछताछ के लिए अस्पताल पहुँचा। उसे सूचना मिली थी कि चौदह साल के साकेत लखानी ने अपनी बिल्डिंग की टेरेस से कूद कर आत्महत्या करने का प्रयास किया था। वह गंभीर रूप से घायल था। आई.सी.यू. में ज़िंदगी की जंग लड़ रहा था। शारिक के सामने बदहवास से माता पिता बैठे थे। स्वयं एक बच्चे के पिता होने के नाते वह उनकी मनःस्थिति समझ सकता था। लेकिन ड्यूटी तो करनी ही थी। "मैं आप लोगों की तकलीफ समझता हूँ। फिर भी पूँछना ज़रूरी है। साकेत को क्या परेशानी थी कि उसने टेरेस से कूद कर आत्महत्या करने की कोशिश की। क्या आप लोगों ने किसी बात के लिए उसे डांटा था?" साकेत के पिता सुंदर लखानी ने जवाब दिया। "जी नहीं। हम तो कभी भी किसी भी बात के लिए उसे नहीं डांटते थे। उसकी हर इच्छा पूरी करते थे।" "जब वह टेरेस से कूदा उस समय घर पर कौन था?" "जी हम दोनों तो अपने अपने काम पर गए थे। घर पर हमारी हॉउस कीपर मरियम थी। लेकिन उस समय ...

प्रगति

सचिन की कार जाम मे फंसी थी। वह एक पांच सितारा होटल में कुछ लोगों से मिलने जा रहा था। यदि डील हो गई तो उसे अपना माल बाहर भेजने का मौका मिलेगा।  वह एक उद्योग चलाता था जहाँ स्थानीय कलाओं पर आधारित कलाकृतियां बनाई जाती थीं। उसके इस उद्योग से कई स्थानी कलाकारों को रोज़गार मिल रहा था। अतः वह चाहता था कि वह अपने व्यापार को और बढ़ाए।  सचिन ने घड़ी देखी। मुलाकात का समय हो गया था। लेकिन वह अभी रास्ते में फंसा था। बाहर हाथ में बैनर और झंडे लिए एक जुलूस कोई विरोध प्रदर्शन करते हुए बढ़ रहा था। सचिन को लग रहा था कि अब शायद ही वह डील कर पाएगा। देर से पहुँचने की वजह वह अपने विदेशी मेहमानों को कैसे समझाएगा।

दैत्य

नकुल ने प्रोफेसर रमाकांत के कमरे में प्रवेश किया तो वह उसे देख कर प्रसन्नता से बोले। "अच्छे समय पर आए। अभी खबर मिली है कि मेरे रिसर्च पेपर को स्वीकार कर लिया गया है। तुमने भी बहुत मेहनत की है। तुम्हारे जैसा योग्य सहायक मिलना सौभाग्य की बात है।" प्रोफेसर साहब की बेटी मालती भी वहीं बैठी थी।  नकुल ने विनम्रता से कहा। "सर आप के आधीन काम करना मेरे लिए सौभाग्य है।" कुछ देर सभी मौन रहे। प्रोफेसर साहब को महसूस हुआ कि नकुल कुछ कहना चाहता है। "कोई बात है? निसंकोच कहो।" नकुल ने मालती की तरफ देखा। फिर कुछ संकोच के साथ कहा। "सर मैं और मालती एक दूसरे को पसंद करते हैं। विवाह करना चाहते हैं।" नकुल की बात सुनते ही प्रोफेसर रमाकांत के चेहरे के भाव बदल गए। उन्होंने मालती की तरफ क्रोध से देखा। फिर नकुल से बोले। "तुमने सोंच भी कैसे लिया कि एक नाजायज़ के साथ मैं अपनी बेटी का ब्याह करूँगा।" उनकी बात नकुल के दिल को छलनी कर गई। वह शब्द जो उसे जीवन भर जलाता रहा था एक बार फिर आग उगलने वाले दैत्य की तरह उसे झुलसा गया।

गांव घर

चंद्रेश करीब बीस साल बाद अपने गांव लौटे थे। गांव में कदम रखते ही उन्हें एहसास हो गया कि अब बहुत कुछ बदल गया है। पहले की तरह किसी ने ना दुआ सलाम की और ना ही हाल चाल पूँछा।  पिछले पंद्रह साल से वह विदेश में थे। लेकिन गांव घर अभी भी यादों में वैसा ही बसा था। लेकिन यहाँ आकर सारी छवि धूमिल पड़ गई। घर पहुँचते ही देहरी को देख वह भाव विभोर हो गए। उन्होंने आगे कदम बढ़ाया ही था कि छोटे भाई ने टोंक दिया। "भइया उधर नहीं। वह मझले भइया का हिस्सा है। मेरा हिस्सा इधर है।" चंद्रेश का मन यह सुनकर खट्टा हो गया। अब गांव में कुछ भी अपना नहीं था।

नारियल

मंदिर के बाहर दुकान लगाए संजीव पहले ग्राहक की बाट जोह रहा था। अभी तक एक भी नारियल नहीं बिका था। उसने सामने से जाती एक महिला को देखा। चेहरे से ही दुखी और परेशान लग रही थी। उसने पुकारा "दीदी"।  कविता ने पलट कर देखा नारियल वाला था।  " नहीं चाहिए भइया।" कह कर वह आगे बढ़ने लगी। "ले लो दीदी। नारियल चढ़ाओगी तो सारे दुख दर्द कम हो जाएंगे।" पिछले कई दिनों से तकलीफें कविता के घर पांव पसारे पड़ी थीं। मन में संशय आया। 'नारियल ना चढ़ाया तो कहीं और विपत्ति ना आ जाए।' कविता ने नारियल खरीद लिया।

शॉपिंग

"वाओ.... देखो अवंतिका यह हैंडबैग कितना सुंदर है।" निशी ने खुशी से उछलते हुए कहा। अवंतिका कुछ देखना नहीं चाहती थी। देखने का मतलब था खरीदने के लिए ललचा जाना। यदि वह जानती कि निशी उसे यहाँ लाने वाली है तो आती ही नहीं। शॉपिंग अवंतिका की कमज़ोरी बन गई थी। ऑनलाइन या शॉपिंग मॉल से कुछ न कुछ खरीदती ही रहती थी। पिछले महीने जब मम्मी उसके पास रहने के लिए आई थीं। तब उसकी इस आदत पर उन्होंने समझाया था। "बेटा तुम अपने पैरों पर खड़ी हो। अच्छा कमाती हो। उसे खर्च करने का भी उसे पूरा हक है। पर मैंने महसूस किया है कि तुम बिना सोंचे समझे खर्च करती हो। पैसे को बचाओ। तुम्हारे ही काम आएगा।" मम्मी की बात उसे समझ आ गई थी। उसने अपने फोन से सारी ऑनलाइन शॉपिंग एप्स डिलीट कर दीं। मॉल में जाना छोड़ दिया। पिछले एक महाने में उसने कुछ नहीं खरीदा था। लेकिन आज फिर वह अपनी कमज़ोरी के सामने थी। अवंतिका ने नज़र उठा कर देखा सचमुच हैंडबैग बहुत सुंदर था। उसका मन ललचा गया। वह उसे उठा कर देखने वाली थी लेकिन उसने खुद को नियंत्रित कर लिया। "तुम्हें खरीदना हो तो ले लो। मुझे आज कुछ नहीं खरीदना।" ...