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दैत्य

नकुल ने प्रोफेसर रमाकांत के कमरे में प्रवेश किया तो वह उसे देख कर प्रसन्नता से बोले।
"अच्छे समय पर आए। अभी खबर मिली है कि मेरे रिसर्च पेपर को स्वीकार कर लिया गया है। तुमने भी बहुत मेहनत की है। तुम्हारे जैसा योग्य सहायक मिलना सौभाग्य की बात है।"
प्रोफेसर साहब की बेटी मालती भी वहीं बैठी थी। 
नकुल ने विनम्रता से कहा।
"सर आप के आधीन काम करना मेरे लिए सौभाग्य है।"
कुछ देर सभी मौन रहे। प्रोफेसर साहब को महसूस हुआ कि नकुल कुछ कहना चाहता है।
"कोई बात है? निसंकोच कहो।"
नकुल ने मालती की तरफ देखा। फिर कुछ संकोच के साथ कहा।
"सर मैं और मालती एक दूसरे को पसंद करते हैं। विवाह करना चाहते हैं।"
नकुल की बात सुनते ही प्रोफेसर रमाकांत के चेहरे के भाव बदल गए। उन्होंने मालती की तरफ क्रोध से देखा। फिर नकुल से बोले।
"तुमने सोंच भी कैसे लिया कि एक नाजायज़ के साथ मैं अपनी बेटी का ब्याह करूँगा।"
उनकी बात नकुल के दिल को छलनी कर गई। वह शब्द जो उसे जीवन भर जलाता रहा था एक बार फिर आग उगलने वाले दैत्य की तरह उसे झुलसा गया।

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