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नारियल

मंदिर के बाहर दुकान लगाए संजीव पहले ग्राहक की बाट जोह रहा था। अभी तक एक भी नारियल नहीं बिका था। उसने सामने से जाती एक महिला को देखा। चेहरे से ही दुखी और परेशान लग रही थी। उसने पुकारा "दीदी"। 
कविता ने पलट कर देखा नारियल वाला था। 
" नहीं चाहिए भइया।" कह कर वह आगे बढ़ने लगी।
"ले लो दीदी। नारियल चढ़ाओगी तो सारे दुख दर्द कम हो जाएंगे।"
पिछले कई दिनों से तकलीफें कविता के घर पांव पसारे पड़ी थीं। मन में संशय आया। 'नारियल ना चढ़ाया तो कहीं और विपत्ति ना आ जाए।'
कविता ने नारियल खरीद लिया।

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