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घरौंदा


मिसेज़ रस्तोगी आंगन में कपड़े सुखाने गईं तो उन्हें कुछ हलचल महसूस हुई. ध्यान से देखा तो पाया कि खिड़की के ऊपर एक चिड़िया तिनका तिनका जमा कर अपना घर बना रही थी. उनके मन में विचार आया 'इस घोंसले में वह अपने अंडे देगी. अंडों से निकले चूज़े एक दिन बड़े हो जाएंगे और घोंसला छोड़ कर उड़ जाएंगे.' 
उन्होंने अपने घर के आंगन को देखा. कभी यहाँ उनके बच्चों की किलकारियां गूंजती थीं. उनका एक भरा पूरा परिवार था. जब बच्चे छोटे थे तब घर तधा जॉब में संतुलन बनाए रखने के लिए उन्हें बहुत मेहनत करनी पड़ती थी. इस काम मे उन्हें अपने पति का भरपूर सहयोग मिला. लेकिन उनके जाने के बाद उनके जीवन में एक खालीपन आ गया. अब सारी चीज़ें उन्हें अकेले संभालनी पड़ती थीं. बच्चे छोटे थे. परंतु उन्होंने कभी हिम्मत नही हारी. धीरज के साथ अपने सारे फ़र्ज़ निभाए. आज उनके सभी बच्चे अपने कैरियर में व्यवस्थित हो चुके थे. घर से दूर सबने अपनी अलग दुनिया बसा ली थी. 
साल में एक बार उनकी दोनों बेटियां तथा बेटा अपने बच्चों के साथ कुछ दिन उनके पास रहने आते थे. उन दिनों में घर का आंगन फिर से गुलज़ार हो जाता था. वह चंद दिन उन्हें ऊर्जा से भर देते थे. 
उन्होंने भी तिनका तिनका घर सजाया था. आज बच्चे बड़े हो गए और अपने अपने आकाश में उड़ने चले गए. पर वह कभी इसका अफसोस नही करती थीं. 
चिड़िया क्या कभी अपने बच्चों की परवाज़ पर अंकुश लगाती है.
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