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अल्लाह हाफिज़


जुनैद रुख़्सती की तैयारी कर रहा था. सारा सामान जाँच लिया था. मन में खुशी और ग़म के मिलेजुले भाव थे. खुशी थी कि अब अच्छे पैसे कमा कर अम्मी की मदद कर सकेगा. किंतु दूसरी ओर अपनों से बिछड़ने का दुख भी था. 
जब से उसके बाहर जाने की बात तय हुई थी अम्मी उसकी सलामती के लिए फ़िक्रमंद थीं. कल ही पीर बाबा की मज़ार पर जाकर उसके लिए दुआ मांगी थी. 
चलते वक्त उसने अम्मी के गले लग उनसे जाने की इजाज़त ली. अम्मी ने माथे का बोसा लिया और एक ताबीज उसके गले में बांध दिया. 
जुनैद को गंडे ताबीज पर यकीन नही था. वह विरोध करने ही वाला था कि तभी उसे अम्मी के चेहरे पर वह तसल्ली नज़र आई जो अब तक नही थी. ताबीज गैर मुल्क में उनके बेटे की सलामती की गारंटी था.
उसने अम्मी को अल्लाह हाफिज़ कहा और घर से निकल पड़ा.

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