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दूर देश का चांद


चांद को निहारते हुए दिलप्रीत ने एक आह भरी. यह चांद उसके पिंड में भी चमकता होगा. आंगन में दारजी और बीजी बैठे अपनी लाड़ली के सुखद भविष्य के बारे में सोंच कर खुश होते होंगे. पास बैठा छोटा वीर पढ़ाई करता होगा. उनके बारे में सोंच कर उसकी आंखें भर आईं. 
कितने चाव से दारजी ने उसका ब्याह किया था. दिल खोल कर खर्च किया था. उनकी लाड़ली बेटी जो थी वह. उसकी हर ख्वाहिश को उन्होंने पूरा किया. 
ताया जी ने मनजीत दीदी का ब्याह लंदन में बसे लड़के से किया. वह बहुत खुश थी. बहुत पैसा था उसकी ससुराल में. जब भी घर आती सबके लिए मंहंगे तोहफे लाती थी. दारजी ने तय कर लिया था कि उसका ब्याह विदेश में बसे लड़के से ही करेंगे. उन्होंने एड़ी चोटी का जोर लगा दिया उसके लिए लड़का ढूंढ़ने में.
आखिरकार कनाडा में बसे सुखविंदर से उसकी जोड़ी जम गई. वहाँ सुखविंदर के परिवार का बहुत बड़ा कारोबार था. अपने स्तर पर दारजी ने जांच पड़ताल करवाई सब सही था. उसकी शादी हो गई. वह कनाडा आ गई.
छह महिने हो गए. वैसे तो सब ठीक है. उसकी ससुराल में बहुत पैसा था. उसे किसी चीज़ की रोक टोक नही थी. वह जो चाहे कर सकती थी. कोई काम काज भी नही करना पड़ता था. लेकिन जिसका हाथ थाम कर वह इस अपरिचित देश में आई थी उसी के पास उसके लिए वक्त नही था. ऐसा नही था कि वह उससे कुछ बहुत अधिक चाहती थी. वह तो बस चाहती थी कि जब सुखविंदर घर आए उसके साथ कुछ देर बैठे. उससे उसका हाल चाल पूंछे. कुछ बात कर उसका मन हल्का करे. लेकिन सुखविंदर उसकी तरफ नज़र भर देखता भी नही था. 
उसे आज कल अपने पिंड अपने घर की बहुत याद आती थी. चाहती थी कि उड़ कर अपनों के पास पहुँच जाए. दारजी के गले से लग जाए. बीजी की गोद में सर रख कर रोकर अपना मन हल्का कर ले. वीर के साथ आंगन में खेल ले. पर यह सब मुमकिन नही था.
वह खिड़की पर आकर खड़ी हो गई. आसमान पर चांद चमक रहा था. उसने चांद को कुछ ऐसे देखा जैसे विनती कर रही हो कि उसके अपनों तक उसका संदेश पहुँचा दे कि वह उन्हें याद करती है.

दूर देश का चांद

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