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तसल्ली


दुलारी मुनिया को गोद में लिए बैठी थी. बुखार से उसका शरीर तवे की तरह जल रहा था. दुलारी समझ नही पा रही थी कि क्या करे. उसके पास कानी कौड़ी भी नही थी. कैसे मुनिया को डॉक्टर के पास ले जाती. अपनी बेटी के लिए कुछ भी ना कर सकने की मजबूरी उसके दिल को जैसे चीरे डाल रही थी. 
वह समझ नही पा रही थी कि क्या करे. उसे पास के पीर बाबा की याद आई. वह उसकी मदद करेंगे. वह बिना कुछ लिए ताबीज देते हैं. अब ऊपर वाला ही मददगार है. 
पीर बाबा के पास से ताबीज लाकर उसने मुनिया के गले में बांध दिया. रात भर वह मुनिया के माथे पर पानी की पट्टियां रखती रही. सुबह की पहली किरण के साथ मुनिया ने आंखें खोलीं और उसे देख कर मुस्कुरा दी.
दुलारी ने हाथ जोड़ कर उस परम शक्ति को धन्यवाद दिया.

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