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माहिर

गली में खड़ा कोई ज़ोर से दरवाज़े की कुंडी खटखटा रहा था।
गिरीश ने खिड़की से झांक कर देखा एक लेनदार वसूली के लिए आया था।
"बाहर निकलो आज पैसा लिए बिना नहीं जाऊँगा।" लेनदार चिल्लाया।
गिरीश को बाहर जाना पड़ा। जाते ही वह हाथ जोड़ कर गिड़गिड़ाने लगा।
"बस कुछ और मोहलत दे दीजिए। वो क्या है कि बच्चा बहुत बीमार हो गया था। बस आप लोगों की दुआओं से मरते बचा है।"
भीतर से उसका बेटा खिड़की से झांक कर देख रहा था। गिरीश ने उस आदमी के घुटने पकड़े हुए थे। आसपास जमा लोग उसे हिकारत से देख रहे थे।
कुछ देर धमका कर लेनदार चला गया। जब गिरीश भीतर आया तो बेटे ने सवाल भरी नज़रें उस पर डालीं।
गिरीश दांत निपोरकर बोला "अरे करना पड़ता है यह सब। झूठ के बिना काम नहीं चलता। तुम्हारा पापा तो माहिर है इसमें।"

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