सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

दोस्त

बाल मनोचिकित्सक अवतार सिंह ने आठ वर्षीय शुभ को प्यार से कुर्सी पर बैठाया। उस नन्हें से बच्चे का कोमल मन कितना आहत था वह जानते थे।
वह शख्स उस पितृविहीन बालक के जीवन में खुशियों के देव के रूप में प्रकट हुआ था। शुभ उसे अपने सबसे नज़दीक मानता था। उस पर सबसे अधिक यकीन करता था। उसमें अपने उस पिता को तलाशता था जो अब नहीं थे।
वह उसके घर में किराएदार था। शुरू शुरू में शुभ की माँ उसे उस शख्स से इतना घुलने मिलने से मना करती थीं। पर धीरे धीरे उन्हें भी यकीन हो गया कि वह शुभ का हितैषी है।
एक दिन वह शख्स शुभ के शरीर से खेल कर उसके कोमल मन को ना भरे जा सकने वाले घाव देकर भाग गया।
अवतार सिंह उन्हें ही भरने का प्रयास कर रहे थे।
"नाम क्या है बेटा तुम्हारा...।"
शुभ शांत बैठा रहा। अवतार सिंह ने उससे बात करने की एक और कोशिश की।
"देखो बेटा मुझे तुम अपना दोस्त समझो...."
यह बात सुनते ही शुभ कुर्सी से उतर कर अपनी माँ के पास आ गया। अवतार सिंह ने उसकी माँ की तरफ प्रश्न भरी निगाह से देखा।
"सर वह शैतान भी कहता था कि वह इसका दोस्त है।"
अवतार सिंह समझ गए कि उस मासूम का विश्वास बुरी तरह कुचल चुका है। उन्हें पहले घायल विश्वास को ठीक करना पड़ेगा।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

मुसाफिर

कल रात अचानक ही बंसल साहब का निधन हो गया। मोहल्ले में जब यह समाचार फैला तो लोग उन्हें अंतिम विदाई देने उनके घर पर एकत्र हुए। अर्थी निकलने की तैयारी हो रही थी। मोहल्ले के दो बुज़र्ग खन्ना जी और पांडे जी बाहर बैठे बात कर रहे थे। "अरे यह तो सबके साथ होना है। हम सब तो मुसाफिर हैं। ना जाने कब स्टेशन आ जाए और उतरना पड़े।" पांडे जी ने दार्शनिक अंदाज़ में कहा। "सही कहा पांडे जी। लेकिन तब भी इंसान माया में फंसा रहता है।" "सुना है बंसल किसी केस में फंसा था। पेंशन अटकी हुई थी।" "अजी जुगाड़ू बंदा था। ऊपर तक पहुँच थी। सब क्लियर हो गया।" खन्ना जी ने रहस्य खोला। "क्या लाभ ऐसे पैसे का। मरने पर इकलौता बेटा भी साथ नही है।"  "सही कहा पांडे जी। अब बेचारी मिसेज बंसल अकेली पड़ गईं।" "अब यह तो सबके साथ है। इस उम्र में जीवनसाथी का ही सहारा होता है।" "बिल्कुल सही। भाभी जी कैसी हैं।" "बेटे बहू के लिए हुड़कती रहती हैं।" "तो शेखर के पास क्यों नही चले जाते।" "उनकी अपनी जिंदगी है। दोनों वर्किंग हैं। वहाँ भी दिन...

भूचाल

लाला हरबंसलाल अपनी पुशतैनी हवेली के आंगन में बैठे थे. जो सामान ले जाया जा सकता था वह गठरियों में बंधा रखा था. उस पर एक नजर डाल कर उन्होंने गहरी सांस ली.  आंगन में गौरैया रोज़ की तरह फुदक रही थी. मुंडेर पर बैठा कौवा भी वैसे ही कांव कांव कर रहा था. प्रकृति का हर काम वैसे ही चल रहा था. कहीं कोई उथल पुथल नही थी सिवाय इंसानी ज़िदगी के. इंसानों के जीवन में भूचाल आया था. मजहब के नाम पर मुल्क दो हिस्सों में बंट गया था. इस बंटवारे ने बहुतों को उनकी जड़ों से अलग कर दिया था.

केंद्र बिंदु

पारस देख रहा था कि आरव का मन खाने से अधिक अपने फोन पर था। वह बार बार मैसेज चेक कर रहा था। सिर्फ दो रोटी खाकर वह प्लेट किचन में रखने के लिए उठा तो पारस ने टोंक दिया। "खाना तो ढंग से खाओ। जल्दी किस बात की है तुम्हें।" "बस पापा मेरा पेट भर गया।" कहते हुए वह प्लेट किचन में रख अपने कमरे में चला गया। पारस का मन भी खाने से उचट गया। उसने प्लेट की रोटी खत्म की और प्लेट किचन में रख आया। बचा हुआ खाना फ्रिज में रख कर वह भी अपने कमरे में चला गया। लैपटॉप खोल कर वह ऑफिस का काम करने लगा। पर काम में उसका मन नही लग रहा था। वह आरव के विषय में सोच रहा था। उसने महसूस किया था कि पिछले कुछ महीनों में आरव के बर्ताव में बहुत परिवर्तन आ गया है। पहले डिनर का समय खाने के साथ साथ आपसी बातचीत का भी होता था। आरव उसे स्कूल में क्या हुआ इसका पूरा ब्यौरा देता था। किंतु जबसे उसने कॉलेज जाना शुरू किया है तब से बहुत कम बात करता है। इधर कुछ दिनों से तो उसका ध्यान ही जैसे घर में नही रहता था। पारस सोचने लगा। उम्र का तकाज़ा है। उन्नीस साल का हो गया है अब वह। नए दोस्त नया माहौल इस सब में उसने अपनी अलग दुनि...