सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

चमत्कार

दफ्तर से आकर मैं बिस्तर पर लेट गया। बहुत थका था। मन ही मन सोंचने लगा " क्या जिंदगी है, घर दफ्तर हर जगह बस टेंशन ही टेंशन है " तभी मेरी नज़र मेरे कमरे की बालकनी पर बैठे बंदर पर पड़ी ' ये क्या मज़े में है। कोई फिक्र नहीं। बस दिन भर उछलते कूदते रहो। ' बंदर ने मुझे देखा  और मैंने उसे। हम एक दूसरे को घूरने लगे। अचानक जैसे बिजली कौंधी। बस एक पल में सब उलट पलट हो गया। मेरी पत्नी कमरे में आई और मुझे देख कर चीख पड़ी "  बंदर हट ....... हट " वह बगल के कमरे से भागकर मेरे बेटे का बैट उठा लाई और मेरी तरफ लपकी। उसका रौद्र रूप देख कर मैं सहम गया। बंदर के शरीर में होने फायदा उठा कर मैं छलांग मार कर बालकनी में आ गया और वहां से दूसरे की बालकनी में कूद गया। मेरी पत्नी बंदर को डांटने लगी "आप मुंडेर पर बैठे बैठे क्या कर रहे हैं।" मैं इधर से उधर कूदने लगा। बड़ा मज़ा आ रहा था। कहीं भी कूद कर चले जाओ, पल भर में ऊपर चढ़ जाओ फिर तेज़ी से नीचे आ जाओ। बहुत देर तक उछालने कूदने के बाद भूख लगने लगी। मैं इधर उधर खाना ढूढ़ने लगा। एक फ्लैट की खिड़की से झाँका। अंदर...

विकल्प

रचनाकार: आशीष त्रिवेदी की लघुकथा - विकल्प मैं कुछ कुछ सामान लेकर लौट रहा था। साथ में मेरी सात वर्ष की बेटी भी थी। एक मकान के सामने भीड़ लगी देख कर मैं  भी कौतुहलवश वहां खड़ा हो गया। अधेड़ उम्र का एक व्यक्ति एक दस बारह साल के बच्चे का कान उमेठ रहा था। लड़का दर्द से चीख रहा था " छोड़ दीजिये अंकल जी अब नहीं करूंगा।" पास खड़े एक अज्जन बोले " अजी एक नंबर का चोर है। इनके घर में घुस कर पेड़ से आम तोड़ रहा था।" मामला समझ कर मैं आगे बढ़ गया। मेरी बेटी ने पूछा " पापा वो अंकल उस बच्चे को क्यों मार रहे थे।" मैंने उसे चोरी करना बुरी बात है यह समझाने के लिहाज़ से कहा " देखो बेटा बिना पूंछे किसी की कोई चीज़ नहीं लेनी चाहिए। उस लड़के ने बिना पूछे उनके पेड़ से आम तोड़े जो गलत है।" कुछ सोंच कर वह बोली " उसे अगर आम खाने थे तो अपने पापा से कहता या जो उसके पास था वही खाता। उसने गलत काम किया।" उसने तो मासूमियत में कह दिया  'उसके पास जो था वही खाता' किन्तु इस बात ने मेरे दिल में हलचल मचा दी। उसे कैसे समझाता कि दुनियां में कुछ लोगों का आभाव इतना अध...

वो

कल मैंने उसे फिर देखा। उन सफ़ेद लिली के फूलों के पास जहाँ वह दस माह पूर्व पहली बार दिखाई दी थी। कई बरस अमेरिका में बिताने के बाद वहां के भाग दौड़ भरे जीवन से मैं थक गया था। अतः  कुछ आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त करने की चाह मुझे मेरे वतन वापस खींच लाई। मैंने इस छोटे से हिल स्टेशन पर यह कॉटेज ले लिया। सैलानियों की आवाजाही न होने से यह जगह बहुत शांत थी। मैं अक्सर ही किसी पहाड़ पर या नदी के किनारे बैठ कर उस परम शक्ति से संबंध स्थापित करने की कोशिश करता था जिसे लोग धार्मिक स्थानों पर ढूँढते हैं। पहले ही दिन से मुझे यह एहसास हो रहा था की मैं कॉटेज में अकेला नहीं हूँ। पढ़ते समय अक्सर मुझे लगता कि अचानक कोई मेरे पास से गुजर गया या कोई बाहर खिड़की पर खड़ा मुझे घूर रहा है। मैं देखता तो कोई नहीं होता। मैं इसे मन का वहम समझ कर टाल देता। उस दिन शाम के समय मैं कॉटेज के गार्डन में बैठ कर ध्यान कर रहा था। अचानक मेरी आँख खुली तो देखा की लिली के फूलों के पास वह खड़ी  थी। उसकी निगाह मुझ पर पड़ी। कुछ पल देखती रही फिर अचानक गायब हो गई। मैं सिहर उठा। मैंने वह रात अपने मित्र के घर बितान...

अंजान फिज़ा

शायरा ने कपड़े गहने जो समेट सकती थी उनकी गठरियाँ बाँध लीं। उसके दोनों बच्चे सो रहे थे। तेरह बरस की शबनम और दस वर्ष का आमिर। उसने दोनों के माथे प्यार से सहलाए और वहीं बैठ गई। बाहर ज़ोरों की बारिश हो रही थी। उसके भीतर भी एक तूफ़ान मचा था। बस कुछ ही घंटों में यह घर गाँव सब छूट जाएगा। वह एक अंजान जगह को अपना बनाने के लिए चली जाएगी। उसके दिल में एक हूक सी उठी। ' ये कैसी आज़ादी मिली है मुल्क को ? ऐसा बवंडर उठा है जिसने लोगों को उनकी जड़ों से ही उखाड़ दिया। क्या इसी दिन के लिए लड़ी गई थी आज़ादी की जंग ?' उसके शौहर गाँधी बाबा के पक्के चेले थे। सन ४ २ में अंग्रेजों की लाठी से चोट खाकर ऐसी खटिया पकड़ी कि तीन साल एड़ियां रगड़ने के बाद मौत नसीब हुई। वह सब क्या इसी दिन के लिए था। अपनी धरती छोड़ कर जाना उसके लिए इतना आसान नहीं था। इसी मिटटी में उसके पुरखे दफ़न हैं। यहीं की आबो हवा में वह पली बढ़ी है। अब सब कुछ छोड़ कर जाने में दिल में दिल में टीस उठती है। उसने कई दफा अपने भाईजान को समझाने की कोशिश की " हम क्यों जाएँ यहाँ से। इतनी ज़िन्दगी बितायी है यहाँ।...

अंतिम पड़ाव

रचनाकार: आशीष त्रिवेदी की लघुकथा - अंतिम पड़ाव अचानक मोबाइल फ़ोन की घंटी बजने लगी। जिसका फ़ोन था वह कुछ झेंप सा गया। फ़ोन लेकर दूसरी तरफ कोने में चला गया। सब लोग जुनेजा साहब की अंतिम यात्रा में शमशान घाट पर इकट्ठे हुए थे। चिता को अग्नि देने की तैयारियां चल रही थीं। संस्कारों में कुछ वक़्त लग रहा था। सभी इस फ़िराक में थे कि जल्द ही फुर्सत पाकर अपने- अपने घर लौटें। अतः समय काटने के लिए लोग धीमे स्वर में बातचीत कर रहे थे। बातों का काफिला महंगाई की मार, राजनीति के गिरते स्तर से होता हुआ कुछ विशेष व्यक्तियों के चरित्र की चीर फाड़ तक आ पहुंचा था।  जुनेजा साहब के बड़े पुत्र ने उन्हें मुखाग्नि दी। चिता धू  धू  कर जलने लगी। कुछ ही समय में समस्त माया, मोह, मान प्रतिष्ठा, अहंकार को पोषित करने वाला शरीर राख बन जाने वाला था। धीरे धीरे लोग वहां से निकलने लगे। छल प्रपंच, राग द्वेष, हार जीत के संसार में वापस जाने के लिए। एक दिन वे भी यहाँ आयेंगे कभी वापस न लौटने के लिए।

संघर्ष

वो सारे चहरे उसके नज़दीक आ रहे थे। धीरे धीरे आवाजें भी साफ़ सुनाई देने लगी थीं। उसे लगने लगा था कि आज वह इन चेहरों को पहचान लेगी। उन आवाजों में से कोई नाम अवश्य उभर कर आएगा। बस वह कुछ ही दूर है अपनी मंजिल से। किन्तु अचानक ही चहरे धुंधले पड़ने लगे। आवाजें मद्धिम हो गयीं। वह अँधेरे में इधर भटकने लगी। घबराहट में वह चीख पड़ी। उसकी नीद खुल गई। वह पसीने से भीगी हुई थी। नर्स भागी हुई आई और उसे पानी पिलाया। फिर उसे तसल्ली देने लगी " घबराओ मत सब ठीक हो जाएगा।"  वह फिर से लेट गयी। आँखों से आंसू छलक पड़े। छः महीने हो गए वह अपनी ही पहचान से अन्जान है। जब कोई उसे आत्मीयता से देखता है तो वह परेशान हो उठती है कि कहीं वह उसका कोई अपना तो नहीं है। उसके इर्द गिर्द सभी व्यक्तियों का एक नाम है। उनकी एक पहचान है। सिर्फ वही अनाम है। अपनी पहचान से दूर है। उसे महसूस होता है इंसान के लिए उसका नाम और पहचान कितने ज़रूरी हैं। उसके लिए इस तरह जीना बहुत ही कष्टप्रद है। वह भीतर ही भीतर घुट रही है।  उसके जेहन में कुछ चहरे हैं। कुछ आवाजें उसके मन में बसी हैं। किन्तु उन चेहरों को वह पहचान नह...

मोहनी

मूर्तिकार ने अपने जीवन की सर्वोत्तम रचना पूर्ण की और उसे निहारने लगा। "सुंदर लगता है अभी बोल उठेगी" अपनी रचना को देख कर अनायास ही उसके मुख से निकल गया। श्रम से क्लांत वह भूमि पर लेट गया और एकटक उसे देखने लगा। देखते देखते ही वह सो गया। रात्रि के तीसरे प्रहार अचानक उस प्रस्तर की प्रतिमा में कम्पन हुआ और वह एक सुंदर यवती में बदल गयी। उसकी कांति से चारों तरफ उजाला हो गया। उसने मूर्तिकार को प्रेम भरे नेत्रों से देखा। एक प्रेयसी की भांति भूमि पर बैठ कर वह उसका माथा सहलाने लगी। मूर्तिकार की नींद टूटी तो उसने देखा की उसकी रचना जीवित हो गयी है। उसे देख कर वह बोला "तुम तो और अधिक सुंदर हो। मेरे मन को मोह रही हो। आज से तुम्हारा नाम मोहनी है।" मूर्तिकार और मोहनी ने मिलकर एक घर बसाया। अपने समर्पण और प्रेम से मोहिनी ने मूर्तिकार का जीवन खुशियों से भर दिया। दोनों सुखपूर्वक एक दूसरे के साथ जीवन बिताने लगे। बहुत वर्ष बीत गए। समय के साथ साथ मोहिनी का प्रेम और गहरा हो गया। किन्तु मूर्तिकार का मोहिनी के लिए आकर्षण कम होने लगा। उसका मन चंचल भंवरे की भांति इधर उधर भटकने लगा। एक दिन वह...