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संदेश

अब और नहीं

वह दफ्तर से बाहर निकली। दोपहर में उसे मैसेज मिला था ' ऑफिस के बाद उसी जगह '। कार उसका इंतज़ार कर रही थी। उसके बैठते ही कार चल पड़ी। वह अपने ख्यालों में खो गयी।  हर कोई उसे केवल अपनी इच्छापूर्ति का साधन मानता है। सुबह घर से निकलते समय पापा सामने आकर खड़े हो गए। वह समझ गई कि उन्हें क्या चाहिए। पर्स खोलकर उसने पैसे उन्हें पकड़ा दिए। हलांकि वह जानती थी कि वह कहाँ  खर्च होंगे। पर क्या कर सकती थी। छोटे भाई को भी कुछ पैसे चाहिए। हर कोई उससे उम्मीद लगाये है। क्या करे वह कुछ समझ नहीं पा रही थी।  कार अपने गंतव्य पर आकर रुक गयी।  वह होटल की तीसरी मंज़िल पर गयी। कमरे में बॉस के अलावा एक और शख्स मौजूद था। करीब उसके पापा की उम्र का। उस आदमी ने उसे ऊपर से नीचे तक ऐसे घूरा जैसे आँखों ही आँखों में उसे पी जायेगा। बॉस बिना कुछ कहे उसे उस आदमी के साथ छोड़ कर चला गया।  उस आदमी की आँखों में वासना के  लाल डोरे तैर रहे थे। अपनी कमीज़ के बटन खोलते हुए वह उसकी तरफ बढ़ा।  " क्या है वह, महज़ एक सामान जिसे कोई भी इस्तेमाल कर सकता है?" इस सवाल ने उसके दिल...

हादसा

पार्वती घर के आँगन में घुटनों में सर छुपाये बैठी थी। सांझ ढल चुकी थी। दीया बाती  का समय हो गया था किन्तु वह अँधेरे में बैठी थी। बाहर से ज़्यादा अँधेरा उसके भीतर था। वह चिंता में थी कि अब अपने तीन बच्चों को कैसे पालेगी। अब गुजारा करना मुश्किल हो गया है। उसे घर की देहलीज़ लांघ कर मेहनत मजूरी करनी पड़ेगी। घर में दो कमाऊ मर्द थे। एक उसका पति तेजा और दूसरा उसका देवर जंगी। पर वो रात उसके जीवन में सदा के लिए अँधेरा कर गई। आज सोंचती है तो अफ़सोस करती है अगर वह खुद को काबू में कर लेती तो ऐसा न होता। तेजा और जंगी दिन भर मेहनत कर के लौटे थे। उसने दोनों की थाली परोस दी। सालन में नमक कुछ अधिक पड़ गया था।  पहला कौर खाते ही तेजा ने थूंक दिया। गुस्से में पार्वती को गालियाँ बकने लगा। पार्वती ने भी दो चार खरी खोटी सुना दी। क्रोध में पागल तेजा ने उसे पीट दिया और पैर पटकता हुआ घर से  निकल गया। जंगी भी अपने भाई को मनाने के लिए उसके पीछे भागा। रात भर दोनों नहीं लौटे। पार्वती ने सुबह तक इंतज़ार किया। पौ फटते ही दोनों की तलाश में निकल पड़ी। खोजते खोजते पहाड़ी पर ...

चंदा ओ चंदा

कर तेज़ी से हाईवे पर भाग  रही थी। मैं कार की खिड़की के बाहर देख रहा था। आज एक अरसे के बाद  मैं अपने घर जहाँ मेरा बचपन बीता था जा रहा था। ज़िंदगी की मसरुफियतों में कुछ इस  कदर उलझ गया था कि जीवन का एक बड़ा हिस्सा, जो मुझसे जुड़ा था पिछले कई सालों से अनदेखा रह गया था। अचानक मेरी नज़र पूनम के चाँद पर पड़ी। चाँदनी में नहाया हुआ चाँद चाँदी की थाली जैसा लग रहा था। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि जैसे वो मेरे साथ साथ ही चल रहा हो। जैसे बिछड़ा हुआ कोई मित्र हो जो बरसों के बाद मिलने पर खुशी से मेरे पीछे पीछे चल रहा हो। चाँद से मेरा बचपन का नाता है। इसकी शुरुआत तब हुई जब मैं एक छोटा सा बालक था। अम्मा मुझे अपनी गोद में बिठाकर खिलाती थीं। उस वक़्त वो एक गीत गाती थीं। चंदा मामा दूर के …पुए पकाएं बूर के … वो मुझे चाँद के झिंगोले की कहानी भी सुनाती थीं। एक बार चाँद ने अपनी माँ से अपने लिए एक झिंगोला सिलाने को कहा लेकिन उसके घटते बढ़ते आकर के कारण उसकी नाप का झिंगोला नहीं सिल पाया। अम्मा ने मुझे यह भी बताया कि चाँद पर बैठी एक बुढ़िया चरखा चला रही है। चाँद पर दिखने वा...

रक्षा सूत्र

सरहद पर स्थित आर्मी पोस्ट में सभी फौजियों में कौतुहल था। एक पत्र सभी के आकर्षण का केंद्र बना था। यह पत्र किसी ख़ास फौजी के लिए नहीं वरन सरहद पर तैनात सभी फौजी भाइयों के लिए था। एक फौजी ने पत्र खोला और सभी सुनने के लिये घेरा बनाकर बैठ गए। फौजी ने पत्र पढ़ना आरम्भ किया फौजी भाइयों प्रणाम, इस विशाल परिवार हिन्दुस्तान, जिसकी सीमाओं की हिफाज़त में आप सभी कठिन परिस्तिथियों में भी तैनात हैं,  मैं उसकी एक छोटी सी सदस्य हूँ।  राखी का पर्व आने वाला है। अतः आपकी छोटी बहन आपके लिए ये रक्षा सूत्र भेज रही है। मैं नहीं जानती कि जब आधुनिक हथियारों से लैस उपद्रवी घात लगा कर हमला करेंगे तो  यह आपकी हिफाज़त कर सकेगा या नहीं। परन्तु यह डोर है उस प्रेम, आस्था और विश्वास की जिससे हम सब बंधे हैं। यह एक एहसास है इस बात का कि अपने घरों में बैठे बहुत से लोग आपके बारे में फ़िक्रमंद हैं। आप सब जो कठिनाईयां उठा कर हमारी रक्षा में लगे हैं, उसके लिए कई मस्तक श्रद्धा से नत होते हैं। जब आप में से किसी को क्षति पहुँचती है तो कई आँखें नम हो जाती हैं। यह धागा उसी श्रद्धा...

चमत्कार

दफ्तर से आकर मैं बिस्तर पर लेट गया। बहुत थका था। मन ही मन सोंचने लगा " क्या जिंदगी है, घर दफ्तर हर जगह बस टेंशन ही टेंशन है " तभी मेरी नज़र मेरे कमरे की बालकनी पर बैठे बंदर पर पड़ी ' ये क्या मज़े में है। कोई फिक्र नहीं। बस दिन भर उछलते कूदते रहो। ' बंदर ने मुझे देखा  और मैंने उसे। हम एक दूसरे को घूरने लगे। अचानक जैसे बिजली कौंधी। बस एक पल में सब उलट पलट हो गया। मेरी पत्नी कमरे में आई और मुझे देख कर चीख पड़ी "  बंदर हट ....... हट " वह बगल के कमरे से भागकर मेरे बेटे का बैट उठा लाई और मेरी तरफ लपकी। उसका रौद्र रूप देख कर मैं सहम गया। बंदर के शरीर में होने फायदा उठा कर मैं छलांग मार कर बालकनी में आ गया और वहां से दूसरे की बालकनी में कूद गया। मेरी पत्नी बंदर को डांटने लगी "आप मुंडेर पर बैठे बैठे क्या कर रहे हैं।" मैं इधर से उधर कूदने लगा। बड़ा मज़ा आ रहा था। कहीं भी कूद कर चले जाओ, पल भर में ऊपर चढ़ जाओ फिर तेज़ी से नीचे आ जाओ। बहुत देर तक उछालने कूदने के बाद भूख लगने लगी। मैं इधर उधर खाना ढूढ़ने लगा। एक फ्लैट की खिड़की से झाँका। अंदर...

विकल्प

रचनाकार: आशीष त्रिवेदी की लघुकथा - विकल्प मैं कुछ कुछ सामान लेकर लौट रहा था। साथ में मेरी सात वर्ष की बेटी भी थी। एक मकान के सामने भीड़ लगी देख कर मैं  भी कौतुहलवश वहां खड़ा हो गया। अधेड़ उम्र का एक व्यक्ति एक दस बारह साल के बच्चे का कान उमेठ रहा था। लड़का दर्द से चीख रहा था " छोड़ दीजिये अंकल जी अब नहीं करूंगा।" पास खड़े एक अज्जन बोले " अजी एक नंबर का चोर है। इनके घर में घुस कर पेड़ से आम तोड़ रहा था।" मामला समझ कर मैं आगे बढ़ गया। मेरी बेटी ने पूछा " पापा वो अंकल उस बच्चे को क्यों मार रहे थे।" मैंने उसे चोरी करना बुरी बात है यह समझाने के लिहाज़ से कहा " देखो बेटा बिना पूंछे किसी की कोई चीज़ नहीं लेनी चाहिए। उस लड़के ने बिना पूछे उनके पेड़ से आम तोड़े जो गलत है।" कुछ सोंच कर वह बोली " उसे अगर आम खाने थे तो अपने पापा से कहता या जो उसके पास था वही खाता। उसने गलत काम किया।" उसने तो मासूमियत में कह दिया  'उसके पास जो था वही खाता' किन्तु इस बात ने मेरे दिल में हलचल मचा दी। उसे कैसे समझाता कि दुनियां में कुछ लोगों का आभाव इतना अध...

वो

कल मैंने उसे फिर देखा। उन सफ़ेद लिली के फूलों के पास जहाँ वह दस माह पूर्व पहली बार दिखाई दी थी। कई बरस अमेरिका में बिताने के बाद वहां के भाग दौड़ भरे जीवन से मैं थक गया था। अतः  कुछ आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त करने की चाह मुझे मेरे वतन वापस खींच लाई। मैंने इस छोटे से हिल स्टेशन पर यह कॉटेज ले लिया। सैलानियों की आवाजाही न होने से यह जगह बहुत शांत थी। मैं अक्सर ही किसी पहाड़ पर या नदी के किनारे बैठ कर उस परम शक्ति से संबंध स्थापित करने की कोशिश करता था जिसे लोग धार्मिक स्थानों पर ढूँढते हैं। पहले ही दिन से मुझे यह एहसास हो रहा था की मैं कॉटेज में अकेला नहीं हूँ। पढ़ते समय अक्सर मुझे लगता कि अचानक कोई मेरे पास से गुजर गया या कोई बाहर खिड़की पर खड़ा मुझे घूर रहा है। मैं देखता तो कोई नहीं होता। मैं इसे मन का वहम समझ कर टाल देता। उस दिन शाम के समय मैं कॉटेज के गार्डन में बैठ कर ध्यान कर रहा था। अचानक मेरी आँख खुली तो देखा की लिली के फूलों के पास वह खड़ी  थी। उसकी निगाह मुझ पर पड़ी। कुछ पल देखती रही फिर अचानक गायब हो गई। मैं सिहर उठा। मैंने वह रात अपने मित्र के घर बितान...