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संदेश

रात

दूर तक फैली सरहद. अंधेरे में पूरी मुस्तैदी से उसकी निगरानी करता गुरबख़श सिंह. आज दीवाली थी. शाम को ही घरवालों से बात हुई थी. सब उसे याद कर रहे थे. उसकी दस महीने की गुड्डी की यह पहली दीवाली थी. वह पूरी तरह चौकन्ना था. ज़रा सी चूक दहशतगर्दों को उसके मुल्क में घुसने का मौका दे देगी. यह मुल्क की शांति के लिए घातक होगा. अपने देश को सुरक्षित रखना उसका दायित्व है. अपनी नाइट विज़न दूरबीन से वह निगरानी रख रहा था. तभी उसे कुछ हरकत दिखाई दी. वह समझ गया कि आतंकवादी हैं. उसने अपनी स्नाइपर गन से दो को ढेर कर दिया. तभी एक गोली आकर उसके सीने में लगी. उसकी चौकन्नी आंखें बंद होने लगीं. मरने से पहले उसने अपना काम कर दिया था. अब बाकी काम उसके साथी करेंगे.

दया

जैसे ही गाड़ियां लाल बत्ती पर रुकीं शन्नो अपने बच्चे को गोद मे उठा कर भागी. वह कार के शीशो पर थपथपा कर भीख मांग रही थी. बाहर चिलचिलाती धूप थी. बच्चा भूख से बिलख रहा था. इस दृश्य ने कई लोगों के मन में दया पैदा की. जिसे जितना सही लगा उसे दे दिया. शाम तक इसी तरह भीख मांगने के बाद शाम को वह अपने डेरे पर लौटी. बच्चे को एक तरफ पटक कर वह दिन भर की कमाई का हिसाब लगाने लगी. बच्चा बहुत भूखा था और ज़ोर ज़ोर से रो रहा था. "चुप हो जा कमबख़त सारी गिनती भुला दी." शन्नो खीझ उठी. उसने आवाज़ लगाई "कहाँ मर गई कम्मो, इसे अफीम चटा दे. रात भर शांत रहेगा." अपनी बात कह कर वह फिर पैसे गिनने लगी.

शुभ दीवाली

पूजा का समय हो रहा था और रंजन ना जाने कहाँ चला गया था. दीपा पूजा की तैयारी करते हुए मन ही मन परेशान हो रही थी.  तीन साल पहले उनका इकलौता बेटा सड़क दुर्घटना में चल बसा था. जब वह जीवित था तो त्यौहार के एक हफ्ते पहले से ही घर में त्यौहार जैसा माहौल हो जाता था. पर अब तो बस औपचारिकता ही बची थी.  रंजन जब घर पहुँचा तो पूजा का मुहूर्त हो चुका था. उसके आते ही दीपा ने उलाहना दी "काम के वक्त तुम हमेशा गायब हो जाते हो. कहाँ चले गए थे." "बाद में बताऊंगा, पहले पूजा कर लेते हैं." रंजन ने उसे शांत करते हुए कहा.  पूजा समाप्त कर दोनों पति पत्नी ने मिल कर घर को दिओं से सजाया. सारा काम निपटा कर दीपा सोफे पर चुप चाप बैठ गई. रंजन उसके पास आकर बैठ गया "चलो तुम्हें दीवाली की रौनक दिखा लाऊं." दीपा की आंखों में पीड़ा उभर आई. रंजन ने उसे दिलासा दिया "चलो तुम अच्छा महसूस करोगी." बुझे मन से दीपा चलने को तैयार हो गई. चारों तरफ रौनक थी. लोग खुशियां मना रहे थे. यह सब देख कर दीपा के मन का सूनापन और बढ़ गया.  रंजन ने कार एक एकांत भवन के सामने रोक दी. यहाँ का माहौल दीपा को कुछ उद...

सुलगता चमन

लंच के बाद कौल साहब टीवी पर न्यूज़ देखने बैठे. कश्मीर के हालात पर एक रिपोर्ट प्रसारित हो रही थी. कश्मीर में सौ से भी अधिक दिनों से कर्फ्यू जारी था. इसने कश्मीर की अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान पहुँचाया था. सुरक्षा बलों पर पत्थर फेंकते उन्मादी युवक, पैलेट गन से घायल बच्चे, भविष्य को लेकर चिंतित छात्र इन सब को देख उनका मन खिन्न हो गया. टीवी बंद कर वह आराम करने चले गए. बिस्तर पर लेटे हुए कश्मीर के अपने पुराने दिनों को याद करने लगे. घाटी की हसीन वादियों में वह हंसी खुशी रहते थे. अचानक ही फिज़ाओं में ज़हरीली धमकियां गूंजने लगीं 'यह ज़मीन छोड़ कर चले जाओ नही तो जान से जाओगे.' शांत घाटी में दहशत का साम्राज्य हो गया. अपने परिवार के साथ उनके जैसे लाखों लोग घाटी छोड़ कर अंजान शहरों में आ गए. उनकी नई पीढ़ी के लिए तो कश्मीर एक समस्या का नाम भर रह गया था. उन्होंने इस उम्मीद से वादी छोड़ी थी कि एक दिन घाटी में अमन होगा और वह फिर अपने घर वापस जा सकेंगे. लेकिन उनका घर तो आज भी सुलग रहा था.

नासूर

पिछले दो हफ्तों से चर्चा में रहा मनु सिंह के लापता होने का केस आज सुलझ गया. पुलिस को मनु का शव शहर के बाहर जंगल में पड़ा मिला. मशहूर व्यापारी भुवन सिंह की इकलौती संतान मनु दो हफ्ते पहले अपने दोस्त की पार्टी से लौटते समय अचानक कहीं गायब हो गया था. इस हाई प्रोफाइल केस को लेकर मीडिया भी बहुत सक्रिय थी. पुलिस जांच में मनु की हत्या के तार उसकी सौतेली माँ से जुड़ने लगे. मनु जब चार साल का था उसकी माँ का स्वर्गवास हो गया. भुवन सिंह उसकी मौसी रंजना को उसकी माँ बना कर ले आए. भुवन सिंह ने रंजना से ब्याह तो किया किंतु उसे पत्नी के रूप में स्वीकार नही कर पाए. मनु अकेला ना पड़ जाए इसलिए उन्होंने दूसरी संतान भी पैदा नही की. पत्नी के देहांत के बाद भुवन सिंह को मनु की परवरिश की चिंता थी. अतः कर्ज़ में डूबे अपने ससुर की मदद इस शर्त पर करने को तैयार हो गए कि रंजना की शादी उससे कर दें. अपने पिता की खातिर रंजना अपने अरमानों को कुचल कर विवाह के लिए तैयार हो गई. इतने सालों से बिना किसी शिकायत के वह अपना फर्ज़ निभाती रही. किसी को भी उसके मन में पल रहे गुस्से का आभास तक नही हुआ. वह गुस्सा बढ़ते बढ़ते नासू...

दफन

खिड़की पर खड़े हुए सरोज की नज़र बाहर क्यारी पर पड़ी. नया नया अंकुर जो भूमि से फूटा था किसी के पैरों के नीचे मसल गया था. उसकी पीड़ा उसने अपनी कोख में महसूस की. उसकी आंखों से आंसू झरने लगे. "यह क्या तूने फिर खाना नही खाया." उसकी सखी शकीला ने कमरे में घुसते हुए कहा. सरोज ने सूनी आंखों से उसकी ओर देखा. शकीला का मन भर आया. उसके सर पर हाथ फेरते हुए बोली "अभी देह कमज़ोर है. बिना खाए कैसे चलेगा. ये ज़ालिम लोग कहाँ छोड़ेंगे. रात को फिर किसी के साथ बिठा देंगे. सहने के लिए ताकत तो चाहिए." कह कर शकीला चली गई. सरोज थाली लेकर बैठ गई. अपनी सारी भावनाओं को उन लोगों ने दिल में दफन कर लिया था. इसी तरह वह सब यहाँ जिंदा रह पाती थीं.

तपस्या

रुक्मणी के बेटे को जब वीरता हेतु पुलिस पदक प्रदान किया गया तो उसकी आंखें भर आईं. अब तक का सफर उसकी आंखों के सामने घटने लगा. पति को व्यापार में बड़ी हानि उठानी पड़ी. उस धक्के से वह उबर नही पाए. हिम्मत हार कर घर पर बैठ गए. उसने पूरी कोशिश की कि उन्हें निराशा से निकाल सके किंतु ऐसा हो नही पाया. एक दिन कागज़ पर दो पंक्तियां लिख कर वह घर छोड़ कर चले गए. उस पर जैसे पहाड़ टूट गया. वह सोंच रही थी कि क्या करे. परंतु जब बेटे की आंखों में भविष्य को लेकर डर देखा तो उसने फैसला कर लिया कि टूटेगी नही. संघर्ष के लिए उसने कमर कस ली. ना जाने कितने तानों के पत्थर उसे मारे गए. कितनी निगाहें उसे भेदती रहीं पर वह अविचल रही. अपनी राह पर बढ़ती रही. आज उसकी तपस्या सफल हो गई थी.