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शुभ दीवाली

पूजा का समय हो रहा था और रंजन ना जाने कहाँ चला गया था. दीपा पूजा की तैयारी करते हुए मन ही मन परेशान हो रही थी. 
तीन साल पहले उनका इकलौता बेटा सड़क दुर्घटना में चल बसा था. जब वह जीवित था तो त्यौहार के एक हफ्ते पहले से ही घर में त्यौहार जैसा माहौल हो जाता था. पर अब तो बस औपचारिकता ही बची थी. 
रंजन जब घर पहुँचा तो पूजा का मुहूर्त हो चुका था. उसके आते ही दीपा ने उलाहना दी "काम के वक्त तुम हमेशा गायब हो जाते हो. कहाँ चले गए थे."
"बाद में बताऊंगा, पहले पूजा कर लेते हैं." रंजन ने उसे शांत करते हुए कहा. 
पूजा समाप्त कर दोनों पति पत्नी ने मिल कर घर को दिओं से सजाया. सारा काम निपटा कर दीपा सोफे पर चुप चाप बैठ गई. रंजन उसके पास आकर बैठ गया "चलो तुम्हें दीवाली की रौनक दिखा लाऊं."
दीपा की आंखों में पीड़ा उभर आई. रंजन ने उसे दिलासा दिया "चलो तुम अच्छा महसूस करोगी."
बुझे मन से दीपा चलने को तैयार हो गई. चारों तरफ रौनक थी. लोग खुशियां मना रहे थे. यह सब देख कर दीपा के मन का सूनापन और बढ़ गया. 
रंजन ने कार एक एकांत भवन के सामने रोक दी. यहाँ का माहौल दीपा को कुछ उदास सा लगा. रंजन ने डिक्की से एक बड़ा थैला निकाला. दीपा कुछ समझ नही पा रही थी किंतु वह बिना कुछ पूंछे उसके साथ भीतर चली गई. एक अधेड़ व्यक्ति ने आगे बढ़ कर उनका स्वागत किया "आइये, बच्चे आपका इंतज़ार कर रहे हैं."
कमरे में कुछ अनाथ बालक थे. रंजन को देख उनके चेहरे खिल उठे. जब दीपा और रंजन ने साथ लाए हुए तोहफे उन्हें दिए तो सब ने खुश होकर उन्हें 'हैप्पी दीवाली' कहा. उसके बाद सब पटाखे जलाने के लिए बाहर आ गए.
अपनी निजी हानि के कारण दीपा के मन में अंधेरा था. लेकिन हंसते मुस्कुराते उन अनाथ बालकों के चेहरे की चमक से वह दूर हो गया. उसने धीरे से रंजन का हाथ अपने हाथ में लेकर कहा "दीवाली मुबारक."

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