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सुलगता चमन


लंच के बाद कौल साहब टीवी पर न्यूज़ देखने बैठे. कश्मीर के हालात पर एक रिपोर्ट प्रसारित हो रही थी.
कश्मीर में सौ से भी अधिक दिनों से कर्फ्यू जारी था. इसने कश्मीर की अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान पहुँचाया था. सुरक्षा बलों पर पत्थर फेंकते उन्मादी युवक, पैलेट गन से घायल बच्चे, भविष्य को लेकर चिंतित छात्र इन सब को देख उनका मन खिन्न हो गया.
टीवी बंद कर वह आराम करने चले गए. बिस्तर पर लेटे हुए कश्मीर के अपने पुराने दिनों को याद करने लगे. घाटी की हसीन वादियों में वह हंसी खुशी रहते थे. अचानक ही फिज़ाओं में ज़हरीली धमकियां गूंजने लगीं 'यह ज़मीन छोड़ कर चले जाओ नही तो जान से जाओगे.'
शांत घाटी में दहशत का साम्राज्य हो गया. अपने परिवार के साथ उनके जैसे लाखों लोग घाटी छोड़ कर अंजान शहरों में आ गए. उनकी नई पीढ़ी के लिए तो कश्मीर एक समस्या का नाम भर रह गया था.
उन्होंने इस उम्मीद से वादी छोड़ी थी कि एक दिन घाटी में अमन होगा और वह फिर अपने घर वापस जा सकेंगे. लेकिन उनका घर तो आज भी सुलग रहा था.


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