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बचपन

आज ज़ोया का मूड फिर ख़राब है. कारण वही आज आदिल का रिजल्ट आया है. उसे क्लास में चौथी रैंक मिली है. ज़ोया चाहती है की वह हमेशा पहले नंबर पर रहे. इसके लिए  उसने कोई कसर  भी नहीं छोड़ी है. आदिल को पढ़ाने के लिए ट्यूटर लगा रखा है. दफ्तर और घर की जिम्मेदारियों के साथ साथ खुद भी उसे पढ़ाती है. आदिल की हर ख्वाहिश पूरी करती  है ताकि वह मन लगा कर पढ़ सके. मैंने तसल्ली देनी चाही तो वही पुराना जवाब " आप समझते नहीं हैं हमारा और आपका वक़्त नहीं है. आज कम्पटीशन का ज़माना है. मेहनत नहीं करेगा तो पीछे रह जाएगा."

मैंने आदिल को समझाया " क्या बात है बेटा सब कुछ तो मिलाता है तुम्हें. किस बात की कमी है. हम तो बस इतना ही चाहते हैं की तुम मन लगाकर पढ़ो, फिर क्यों.

 आदिल ने कोई जवाब नहीं दिया किन्तु मैंने उसकी आँखों में एक खामोश शिकायत पढ़ ली " क्या करूं कितनी मेहनत तो करता हूँ."

मैं स्टडी में आ गया. एक क़िताब  लेकर पढ़ने की कोशिश करने लगा. किन्तु मन नहीं लग रहा था. बार बार आदिल का ख्याल आता है. सही तो है उसकी शिकायत. कितनी मेहनत करता  है. सुबह स्कूल जाता है. स्कूल से लौटकर आता है तो कुछ ही देर में ट्यूटर पढ़ाने आ जाता है. उस के बाद होमवर्क. कितना कम वक़्त मिलता है उसे खेलने के लिए. मैं अपने  बचपन की याद करने लगा. कितनी बेफ़िक्री के दिन थे. पढ़ते लिखते थे और जी भर कर खेलते थे. अम्मी अब्बा हमारे पास हो जाने भर से खुश हो जाते थे.

सच कह रही थी ज़ोया हमारा वक़्त नहीं रहा. हम अपने बच्चों को कितना कुछ देते हैं. उनकी हर ख्वाहिश पूरी करते हैं. किन्तु अपनी अनेक ख्वाहिशें उन पर लाद देते हैं. सब कुछ देकर हम उनसे वह छीन लेते हैं जिस पर उनका सबसे ज्यादा हक है. जीवन का सबसे सुंदर वक़्त जिसे बचपन कहते हैं.

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