बहुत देर तक फैशन
टीवी पर नपे तुले कदमों से चलती सांचे में ढले हुए अंगो वाली
माडलों को देखता रहा. दिमाग में वासना का एक सागर हिलोरें मार रहा था.
सोंचा चलो कुछ देर चहल कदमी कर लूं . घर से निकल कर बाजार की तरफ चल दिया.
चलते हुए सड़क के किनारे बैठी 18 ,19 साल की एक भिखारिन पर नज़र पड़ी.
तंग फटे हुए कपड़ों से सारा शारीर झांक रहा था. मन में फिर वही तरंगें जोर
मारने लगीं. नज़र उसकी खुली हुई छाती पर पड़ी. एक बच्चा छाती से चिपका
हुआ बड़े इत्मिनान से दूध पी रहा था. वो लड़की भी सारी
दुनिया से बेखबर पूर्ण संतोष से उस बच्चे का मुख देख रही थी. अचानक
सारी वासना आंख के रस्ते पानी बनकर बह गयी. बेसाख्ता मुह से निकल पड़ा
"माँ"
पारस देख रहा था कि आरव का मन खाने से अधिक अपने फोन पर था। वह बार बार मैसेज चेक कर रहा था। सिर्फ दो रोटी खाकर वह प्लेट किचन में रखने के लिए उठा तो पारस ने टोंक दिया। "खाना तो ढंग से खाओ। जल्दी किस बात की है तुम्हें।" "बस पापा मेरा पेट भर गया।" कहते हुए वह प्लेट किचन में रख अपने कमरे में चला गया। पारस का मन भी खाने से उचट गया। उसने प्लेट की रोटी खत्म की और प्लेट किचन में रख आया। बचा हुआ खाना फ्रिज में रख कर वह भी अपने कमरे में चला गया। लैपटॉप खोल कर वह ऑफिस का काम करने लगा। पर काम में उसका मन नही लग रहा था। वह आरव के विषय में सोच रहा था। उसने महसूस किया था कि पिछले कुछ महीनों में आरव के बर्ताव में बहुत परिवर्तन आ गया है। पहले डिनर का समय खाने के साथ साथ आपसी बातचीत का भी होता था। आरव उसे स्कूल में क्या हुआ इसका पूरा ब्यौरा देता था। किंतु जबसे उसने कॉलेज जाना शुरू किया है तब से बहुत कम बात करता है। इधर कुछ दिनों से तो उसका ध्यान ही जैसे घर में नही रहता था। पारस सोचने लगा। उम्र का तकाज़ा है। उन्नीस साल का हो गया है अब वह। नए दोस्त नया माहौल इस सब में उसने अपनी अलग दुनि...
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