बहुत देर तक फैशन
टीवी पर नपे तुले कदमों से चलती सांचे में ढले हुए अंगो वाली
माडलों को देखता रहा. दिमाग में वासना का एक सागर हिलोरें मार रहा था.
सोंचा चलो कुछ देर चहल कदमी कर लूं . घर से निकल कर बाजार की तरफ चल दिया.
चलते हुए सड़क के किनारे बैठी 18 ,19 साल की एक भिखारिन पर नज़र पड़ी.
तंग फटे हुए कपड़ों से सारा शारीर झांक रहा था. मन में फिर वही तरंगें जोर
मारने लगीं. नज़र उसकी खुली हुई छाती पर पड़ी. एक बच्चा छाती से चिपका
हुआ बड़े इत्मिनान से दूध पी रहा था. वो लड़की भी सारी
दुनिया से बेखबर पूर्ण संतोष से उस बच्चे का मुख देख रही थी. अचानक
सारी वासना आंख के रस्ते पानी बनकर बह गयी. बेसाख्ता मुह से निकल पड़ा
"माँ"
कल रात अचानक ही बंसल साहब का निधन हो गया। मोहल्ले में जब यह समाचार फैला तो लोग उन्हें अंतिम विदाई देने उनके घर पर एकत्र हुए। अर्थी निकलने की तैयारी हो रही थी। मोहल्ले के दो बुज़र्ग खन्ना जी और पांडे जी बाहर बैठे बात कर रहे थे। "अरे यह तो सबके साथ होना है। हम सब तो मुसाफिर हैं। ना जाने कब स्टेशन आ जाए और उतरना पड़े।" पांडे जी ने दार्शनिक अंदाज़ में कहा। "सही कहा पांडे जी। लेकिन तब भी इंसान माया में फंसा रहता है।" "सुना है बंसल किसी केस में फंसा था। पेंशन अटकी हुई थी।" "अजी जुगाड़ू बंदा था। ऊपर तक पहुँच थी। सब क्लियर हो गया।" खन्ना जी ने रहस्य खोला। "क्या लाभ ऐसे पैसे का। मरने पर इकलौता बेटा भी साथ नही है।" "सही कहा पांडे जी। अब बेचारी मिसेज बंसल अकेली पड़ गईं।" "अब यह तो सबके साथ है। इस उम्र में जीवनसाथी का ही सहारा होता है।" "बिल्कुल सही। भाभी जी कैसी हैं।" "बेटे बहू के लिए हुड़कती रहती हैं।" "तो शेखर के पास क्यों नही चले जाते।" "उनकी अपनी जिंदगी है। दोनों वर्किंग हैं। वहाँ भी दिन...
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