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दर्द का रिश्ता

 

शहर में सन्नाटा पसरा है। ऐसा लगता है की पिछले दिनों हुए मानवता के नंगे नाच को देखकर वक़्त भी थम कर रह गया है। यूं तो शहर शांत है किन्तु राख के ढेर में अभी भी चिंगारियां दबी हैं। ज़रा सा कुरेदने पर धधक उठेंगी। लोगों में तनाव है। दोनों पक्षों की ओर से आरोप प्रत्यारोप जारी हैं।

मेरी ड्यूटी शहर के अस्पताल के शवगृह में लगी है। अपने परिजनों के शव तलाश करने वालों का ताँता लगा है। मेरे सामने दो महिलाएं बैठी हैं। एक कुछ स्थूल शरीर की मुस्लिम महिला है जो अपने दुपट्टे से अपने आंसू पोंछ रही है। दूसरी सफ़ेद साड़ी में एक हिन्दू महिला है जो आंसुओं से अपना आंचल भिगो रही है। दोनों ही फसाद में मारे गए अपने पुत्रों का शव लेने आई हैं।

औरों की तरह मेरे मन में भी दूसरे पक्ष के प्रति क्रोध है। मैंने एक हिकारत भरी दृष्टि उस मुस्लिम महिला पर डाली और फिर सहानुभूति से हिन्दू स्त्री को देखने लगा।

उन दोनों महिलाओं की दृष्टि एक दूसरे पर पड़ी। कुछ देर तक एक दूसरे को देखती रहीं। जैसे आँखों ही आँखों में एक दूसरे से कुछ कह रही हों। फिर मुस्लिम महिला अपनी जगह से उठी। हिन्दू स्त्री भी कुछ कदम आगे आई। कुछ देर यूँ ही खड़ी रहीं। मैं साँस रोके देख रहा था। कुछ देर यूँ ही खड़ी रहने के बाद मुस्लिम महिला ने उस हिन्दू स्त्री को गले लगा लिया। दोनों एक दुसरे से लिपट कर सुबकने लगीं।

मेरे भीतर कहीं कुछ दरक गया। बहार लोग दो धड़ों में बटे एक दूसरे का खून बहा रहे हैं। यहाँ ये दो स्त्रियाँ मजहब की दीवार गिराकर एक दूसरे का दुःख बाँट रही हैं। क्योंकि वे मुसलमान या हिन्दू नहीं सिर्फ "माँ "हैं।

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