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ऐ ज़िंदगी

गिरीश अनमना सा खिड़की के बाहर देख रहा था।
"बेटा खाना लगा दूँ। भूख लगी होगी।" उसकी माँ ने सर पर हाथ फेरते हुए पूंछा।
"मन नही है। आप खा लीजिए।"
माँ उसकी मनःस्थिति समझती थीं। उन्होंने अधिक ज़ोर नही दिया।
गिरीश का अब किसी भी काम में मन नही लगता था। उसके लिए ज़िंदगी जैसे ठहर सी गई थी। निरुद्देश्य सा वह खिड़की के बाहर देख रहा था। तभी बंदरों का एक दल आकर उछल कूद करने लगा। दल में नर मादा बच्चे सभी थे। वह सामने वाले नीम के पेंड़ पर और बिजली के तारों पर झूल रहे थे। पर उनमें से एक बंदर कुछ अलग था। गिरीश ने ध्यान से देखा। उसकी एक बांह क्षतिग्रस्त थी। वह केवल एक ही बांह का प्रयोग कर पा रहा था। लेकिन फिर भी वह निष्क्रिय नही बैठा था। बाकी सबकी तरह वह अपनी एक बांह से झूला झूल रहा था।
गिरीश ने अपनी व्हीलचेयर घुमाई और किचन में काम करती हुई माँ के पास गया।
"मम्मी खाना लगा दीजिए। खाने के बाद आज कुछ लिखूंगा।"

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