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गहरी सांस

सर्वाधिक ऊंचे टावर की सबसे ऊपरी मंज़िल पर बैठा मानव अपनी तरक्की का जायज़ा ले रहा था। सामने स्क्रीन पर उसे बाहर का दृश्य दिखाई पड़ रहा था। ऊंची ऊंची इमारतें, ओवरब्रिज, सड़कों पर लगा गाड़ियों का लंबा जाम। इन सब के बीच कहीं भी उसे पेंड़ पौधे नही दिखे। स्मार्ट सिटी के निर्माण में उनकी ही बलि दी गई थी। उसे गर्मी सी महसूस हुई। एक बटन के स्पर्श मात्र से कमरे का तापमान बदल गया। 
उसने स्क्रीन से नज़र हटाई तो सामने खाली पड़ा पानी का जग मुंह चिढ़ा रहा था। आज उस छोटे से जग को भरने की भी हैसियत नही रही। मोबाइल ने भी चेतावनी दी कि अब उसके पास कुछ ही शुद्ध सांसें बची हैं। रिफिल का समय हो गया है। पर आजकल तो उसकी भी किल्लत है। अचानक ना जाने कैसी सनक सवार हुई कि वह उठ कर टैरेस पर आ गया। चेहरे पर लगा ऑक्सीजन मास्क हटाया और एक गहरी सांस ली। दोनों फेफड़े पूरी तरह से भर गए। एक अर्से के बाद उसने दिल खोल कर सांस लेने की अपनी इच्छा पूरी की थी। यह इच्छा अंतिम साबित हुई।

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