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बेल

डॉ. कुलभूषण ने जब अपने सहायक शैलेंद्र को देखा तो वह उन्हें जाना पहचाना लगा। वह आज ही उनके साथ काम करने आया था। दिमाग पर ज़ोर डाला तो याद आया कि वह तो उनके पड़ोसी गुप्ता जी का भतीजा था। माता पिता की मृत्यु के बाद वह उनके घर में रहता था। लेकिन चाचा चाची के व्यवहार से तंग आकर किशोरावस्था में घर से भाग गया था।
उन्होंने शैलेंद्र से पूँछा कि घर से भागने के बाद वह इस मुकाम तक कैसे पहुँचा। उसका तो और कोई रिश्तेदार भी नहीं था।
शैलेंद्र ने बताया कि घर से भागने के बाद कुछ दिन वह इधर उधर आवारा भटकता रहा। एक दिन उसे एक भला आदमी मिला जिसने उसे समझाया कि जीवन व्यर्थ करने के लिए नहीं है। उन्होंने दोबारा उसकी पढ़ाई शुरू करवाई। लेकिन कुछ ही दिनों में उनका भी स्वर्गवास हो गया। पर उन्होंने जो राह दिखाई थी वह उस पर चलता रहा। इसी कारण आज वह यहाँ है।
"लेकिन जब सहारा देने वाला कोई नहीं था तब तो यह बहुत कठिन रहा होगा।" डॉ. कुलभूषण ने पूँछा।
"सर बाहर गार्डन में बेल लगी है। वह रौशनी की तरफ बढ़ती है। अतः ऊपर चढ़ने के लिए सहारा ढूंढ़ ही लेती है। बस सर मैंने भी आगे बढ़ने की ठान ली थी। इसलिए जिस चीज़ का सहारा मिलता था उसे आधार बना कर आगे बढ़ने का प्रयास करता था।"

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